Tuesday, March 14, 2017

भाजपा की उत्तर प्रदेश में जीत के मायने बनाम हिटलरशाही की दस्तक !


कहते हैं लोकतंत्र में जब तक बोलने की आजादी ना हो तो वो लोकतंत्र किसी काम का नहीं है। ठीक इसी तरह से संसद में अगर पक्ष की बात काटने वाला या सवाल करने वाला विपक्ष ना हो तो ऐसी सरकार का निरंकुश होना स्वाभाविक ही नहीं सौ प्रतिश्त संभव भी है।
क्योंकि जब विपक्ष कमजोर होगा तो सत्ता में रहने वाली सरकारें अपनी मनमर्जी करेंगी और सत्ता के नशे में वो फैसलें लेंगी जो उनकी शक्ति को बढ़ा सके।
इसका ताजा उदहारण जेएनयू प्रकरण है और उसके बाद दिल्ली विश्वविद्यालक का उदहारण। सवाल ये भी उठता है कि आखिर इतनी बड़ी विजय भाजपा को लगातार क्यों मिल रही है। और क्यों देश में लगातार लीडरशीप भी टूट रही है।
इसकी सीधी वजह पर गौर करें तो हम पाएंगे कि इस कारण का सबसे बड़ा कारण हमारे द्वारा चुनी गए वो सरकारें थी जिनकी योजनाएं जन जन तक नहीं पहुंची और भ्रष्टाचार ने अपनी जड़े सिस्टम में बना ली। जिसके बाद सरकार की शक्तियां कुछ हाथों में ही रह गयी और सत्ता की बार बार चाबी मिलने के बाद भी आम लोगों की जिंदगी में बदलाव नहीं आया हां, भ्रष्टाचार की वजह से लोग सरकारों के खिलाफ जरूर आ गए। ऐसे में दिल्ली से एक नयी उम्मीद की किरण तो जरूरी फूटी लेकिन, वो भी आगे चलकर
बिखर गयी। ऐसे में शीर्ष नेतृत्व की सरकार के पास मौका भी था औऱ ताकत भी कि उसने उत्तर प्रदेश में वो इतिहास लिख दिया जो शायद आजतक की किसी पार्टी ने नहीं लिखा।
उत्तर प्रदेश में भाजपा ने 323 सीटों पर विजय पताका फहराई है। वहीं, इस जीत के साथ ही देश का बुद्धिजीवी इस असमंजस में है कि वो लोकतंत्र के इस सबसे बड़े महाकुंभ के खत्म होने के बाद अभिव्यकित की आजादी, दलित की प्रदेश में स्थिति और लॉ एंड ऑर्डर की स्थिति क्या होगी?
इतना ही नहीं देश का बुद्धिजीवी कहीं ना कहीं ये भी मानने लगा है कि अब या तो स्थिति खराब होगी या फिर बेहतर।
खराब इसलिए हो सकती है क्योंकि ये बात तय है कि इस जीत के बाद स्वर्ण जाति के लोगों का दबाव या ये कहें कि उनकी मनमर्जी ज्यादा बढ़ेगी। अब थानों में फिर से पांडे जी, तिवारी जी एक्टिव मोड में दिखाई देंगे और हो सकता है इस बीच पूरे राज्य में एक बार फिर वहीं स्थिति हो जो आज से 20 साल पहले प्रदेश में थी। यानी की स्वर्णजाति की दबंगई।
और ये दबंगई कोई ऐसी भी नहीं है कि सपा और बसपा के राज में खत्म हो गयी हो। हां, कम जरूर हो गयी थी। लेकिन, अब ये बात तयशुदा मानी जा सकती है कि अब दबंगई हो सकती है। शायद सरकार को भी इस बात का अंदाजा हो और वो प्रदेश में शासनव्यवस्था को ठीक रखने की दिशा में काम कर भी रही हो। लेकिन, ये तब तक नहीं माना जा सकता जब तक की प्रदेश के मुखिया का चेहरा साफ नहीं हो जाता। क्योंकि प्रदेश मे लॉ एंड ऑर्डर की स्थिति क्या होगी ये प्रदेश के मुखिया पर भी निर्भर करेंगा।
वहीं, दूसरी ओर स्थिति में सुधार इस तरह भी हो सकता है कि अगर भाजपा सरकार प्रदेश में रोजगार, शिक्षा, और प्रशासन पर ध्यान देती है तो फिर चौमुखी विकास संभव है। जिसके बाद शायद प्रदेश एक नयी दिशा की ओर बढ़े। लेकिन, ऐसा अगर नहीं हुआ तो स्थिति क्या होगी इसका अंदाजा लगाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन भी है।    

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