Thursday, March 13, 2014

आदमी के पंख नहीं होते
पर परबाज उड़ने का हौंसला देता है।
अगर आंखों में हो सपने
तो रास्ता आवाज देता है।

ये कविता किसकी है मुझे याद नहीं। लेकिन, जब कभी भी इन लाइनों को याद किया दिल में एक नया जज्बा पैदा हुआ।
लगभग 15 साल के पत्रकारिता के कैरियर में हर साल दो साल में ये लाइन मुझे तब याद आई जब मुझे किसी ना किसी बजह से या तो नौकरी छोड़नी पड़ी या फिर मुझे निकाला गया। आज जिंदगी ऐसे मोड़ पर है जहां सच लिखना मजबूरी भी है और आदत भी। हालांकि कुछ लोग जो मेरे हमउम्र है और पत्रकारिता के धंधे में पारंगत होकर मक्कारी की हदें पार करके तरक्की पा चुके हैं...आज शब्दों की बाजीगरी करके अपनी मक्कारी को कामयाबी और भाग्य, समय आदि इत्यादी का जामा पहना कर पेश करते हैं।
हाल ही में एक मित्र को 10 साल साहब के जूते उठाने के काम से निकाल दिया गया या धक्कियां दिया गया। यहां ये शव्द भी इस्तेमाल किया जा सकता है की अब साहब को उनकी पसंद नहीं आ रही इसलिए कोठे से बाहर कर दिया गया। अब ये साहब अपने निकाले जाने पर खुन्नस में है। अपने आप को वो हमेशा से एक ऐसा व्यक्ति समझते रहे जो भीड़ से अलग है। कहते रहे...मैं ये नहीं करुंगा मैं वो नहीं करूंगा यहां तक की मैं काम क्रोध और मद में विश्वास नहीं रखता जबकि उनका काम उनके बच्चों में दिखाई देता है और क्रोध और मद आदात में। खैर मुद्दा ये नहीं है। मुद्दा ये है की आदमी एक उम्र के बाद जब नौकरी से निकाला जाता है। या फिर जब उससे बेहतर आदमी उसकी जगह खड़ा होता है तो आदमी अपने आप को समझ क्यों नहीं पाता। इसके अलावा सवाल ये भी है की जब कभी भी मैंने इस विचार को पाला की व्यक्ति की तरक्की संस्थान में नहीं बल्कि उसके काम में है तो लगा की शायद मैं गलत हूं। लेकिन, जब कभी भी इस तरह के नमूनों को लेखनी पर रोते बिलेखते देखा लगा की शायद मेरा सोचना शत प्रतिशत सही है। तरक्की काम में ही है।
मैं यहां ये बात इस लिए भी लिख रहा हूं की शायद उस शख्स को ये पत्री कभी हाथ लगे और महसूस हो की वाकई लोगों को धोखा देना, मक्कारी से नौकरी पा लेना और अपनों से गद्दारी कर देना ही तरक्की नहीं है। तरक्की के कई मायने है। और तरक्की का मामला जब इंसान से जुड़ा हो तो उसके अर्थ भी बदल जाते हैं। मेरी नजर में तरक्की परिवार की खुशी और सदाचार है। वो आचरण है जिसे लोग पसंद करें। वो व्यवहार है जिससे समाज के आसपास के लोग स्वीकार करे। ये सामाजिक परिवेश का तानाबाना भी है।
लड़ कर जंग जीतना और मन जीत कर जंग जीतना दो अलग अलग बातें हैं। लड़ कर मैदान जीते जा सकते हैं  इंसानों को जीतने के लिए पहले अपने मन को हराना आवश्यक है। 
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