Thursday, January 13, 2011

दिल्ली पुलिस सदैव आपके साथ


सेठ मुझे क्या तुमने बदमाश समझा हुआ है जो दस 20 लाख रुपये का रिश्वत लेगा....लेकिन में तुम्हारा दिल नहीं तोड़ेगा....एक काम करो ....वो जो बिल्डिंग तुम बना रहे हो उसमें से ग्राउंड फ्लोर का फ्लैट मेरी बीबी के नाम कर दो...लेकिन इंस्पेक्टर साहब वो तो ढेड़ करोड़ रुपये का है...अबे तो क्या हुआ क्या तेरी जान से ज्यादा कीमती है। ये डायलॉग फिल्म वांटेड का है जिसमें संजय मांजेरकर एक पुलिसवाले का किरदार निभा रहे हैं और एक बिल्डर की शिकायत पर बदमाशों को इनकाउंटर करते हैं....जिसके बदले में वो बिल्डर से ये डिमांड रखते हैं। ये फिल्म की बात है लेकिन असल जिंदगी में भी पुलिस का चेहरा ठीक ऐसा ही है। दिल्ली पुलिस देश के सबसे तेज तर्रार और आधुनिक पुलिस मानी जाती है। लेकिन हाल ही में दिल्ली पुलिस के कमीश्नर वी के गुप्ता ने कहा है कि दिल्ली को सुधारने में अभी तीन साल का समय लगेगा। यानी तीन साल में दिल्ली में यूं ही कत्ले आम और मारकाट मची रहेगी। लोगों को सरेआम बदमाश लूट लेंगे और दिल्ली पुलिस तीन साल तक दिल्ली में सुधार करने के तरीकों पर विचार करती रहेगी।

ये कैसा बयान है और इस बयान के माध्यम से कमीश्नर साहब क्या कहना चाहते हैं। हालांकि ये बात ठीक है कि दिल्ली में लगातार भीड़ बढ़ रही है और यहां की कानून व्यवस्था बनाये रखने के लिए दिल्ली पुलिस को खासी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। लेकिन दिल्ली में पुलिस की तैनाती और कार्यकुशलता की अगर बात की जाये तो दिल्ली पुलिस देश की सबसे हाईटेक और भरोसेमंद पुलिस मानी जाती है। इसके पास वो सभी नयी तकनीक है जो आधुनिक पुलिस के पास होनी चाहिए। लेकिन फिर भी दिल्ली पुलिस बदमाशों के पीछे लकीर पिटती नजर आती है। इसका पहला कारण ये भी है कि दिल्ली पुलिस में कई सालों से सिपाहियों को नई तकनीकों की ट्रेनिग नहीं दी गयी है। वहीं दिल्ली पुलिस अभी भी पुराने ढर्रे पर चलकर बदमाशों को पकड़ने के लिए मुखबिरों पर ही आश्रित है। हालांकि मुखबिर हमेशा से ही एक अच्छा सोर्स ऑफ इंफोर्मेशन रहे हैं...लेकिन यहां दिल्ली पुलिस की हाईटेक तकनीक पर अगर गौर डाले तो दिल्ली पुलिस के पास लोकल एरिया पर चौंकसी ना के बराबर है। पुलिस का लोकल नेटवर्क कमजोर है। लोकल स्तर पर पुलिस केवल हफ्ता और महीने की पत्ती पर ही जोर देती है। किस थाने से कितना आ रहा है इसका पूरा ब्यौरा सिपाही थानेदार और फिर थानेदार अपने से ऊपर और ऊपर से और ऊपर तक पहुंचाता है। थानों की नीलामी होती है और हर थाने से महीना फिक्स्ड होता है। अगर आपको यकीन नहीं है तो दिल्ली पुलिस के सिपाहियों और उनके अफसरों के घर जाकर देखिए... आपको यकीन हो जायेगा कि कम समय में तरक्की कैसे पायी जाती है। दिल्ली के किसी भी सिपाही के पास कम से कम एक करोड़ रुपये की संपत्ति है। ये सिपाहियों की संपत्ति है....अगर ठीक इसी तरह से अगर अफसरों की कमाई का ब्यौरा मांगा जाये तो साधारण आदमी के होश फाख्ता हो जाएंगे। दिल्ली पुलिस के कर्मचारियों की आजतक किसी ने आय का ब्यौरा नहीं मांगा न ही अफसरों की कमाई की जांच की गई। हां इक्का दुक्का अफसर जरूर छोटे मोटे घपले में आता रहा जिसे यूं ही रफा दफा कर दिया गया।

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