Friday, November 26, 2010

दोस्त

कुछ तो रहा ही होगा उसके दिल में
रिश्तों में खटास यूं ही आया नहीं करती।

वक्त लगता है बीज को वृक्ष होने में
यूं ही कोई किसी को छाया दिया नहीं करता।

था वो सैंकड़ों लाखों परिंदों का घर
यूं ही कोई पेड़ काटकर किसी का घर उजाड़ा नहीं करता।

सीने में खंजर इस दुनिया में दुश्मन कहां उतारते हैं
अपने बनकर ही पीठ में खंजर अक्सर लोग उतारा करते हैं।

वो दोस्त ही था मेरा ऐसा वो अक्सर कहता था।
एक रोज उसने हाथ भी रखा था पार्थ किश्लय के सर पर
कहा था मेरी पत्नी को अपनी बहू भी खुले में....

फिर अचानक एक कहानी फिर खुद को दोहरा गई...
सुना थी जो बचपन में अपने पिता से मैंने कई बार

पिता जी कहते थे दो दोस्ती थी राजा और रंक के बीच
बड़ी अजीज

रहते न था एक दूसरे के बगैर

फिर एक दिन एक शैतान ने तोड़ी उनकी दोस्ती

फुसफुसाकर कान में गरीब के कुछ कहने का बहाना किया
अमीर देखता रहा.. पास आया और गरीब को उल्हाना दिया।
गरीब चाह कर भी सफाई में कुछ न कह पाया
अमीर का पारा आसमान पर चढ़ा
और दोस्ती जमीन पर निढाल पड़ी रह गई।
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