Saturday, September 18, 2010

एक कलाकार का अंतिम युद्ध


देश के लिए कला के क्षेत्र में एक कैनवास देने वाला शख्स आज देश से बाहर महाभारत को चित्रों के माध्यम से कैनवास पर उतारने में व्यस्त है।
फिदा और फिदा का कैनवास इस बात पर कभी नहीं झगड़ते कि कैनवास पर उतर कर कौन आ रहा है। कलाकार के मन ने कहा कि चलो ये किया जाए और कलाकार अपनी कूची ब्रश के साथ कैनवास की शान में लकीरे खीचना आरंभ कर देता है।
एम एफ हुसैन को ये अंदाजा है कि महाभारत के कुछ किरदारों पर उनकी भर्त्सना हो सकती है। इसका कारण शायद ये भी हो कि एक कलाकार जब इतिहास के ब्रश से कैनवास पर उतारता है तो वह दिल और दिमाग से किरदार के साथ होता है। वह उस किरदार के साथ जीता है और मरता है। गजगमीनी हो या फिर फिदा के घोड़े। वह आजाद विचरण करते हैं। लेकिन कुछ कला को नहीं समझने वालों को इस बात से परेशानी हो सकती है कि भला किसी किरदार में कलाकार कैसे सांस ले सकता है।
एम एफ हुसैन जब देश में थे तो लोगों को उनके होने या नहीं होने का मतलब मालूम नहीं था। देश के कुछ प्रगतिशील विचारकों को अचानक ही हुसैन की याद तब आयी जब हुसैन को देश में एक पहचान मिलनी आरंभ हुई। उनके द्वारा बनाई गई होली की पेंटिग अनूठी थी। लोगों को इस बात का शायद ही अंदाजा था कि बगैर ब्रश के लिए कैनवास पर रंगों को और प्राकृतिक रूप से पैदा हुई भावनाओं को उकेरा जा सकता है। वह होली के दिन रिक्शे पर सवार हुए और देश के गलियों में धूमने लगे। जिस किसी ने भी उनपर रंग डाला उन्होंने कैनवास को आगे कर दिया। और फिर कैनवास पर वह उतरा जिसे शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता। उनकी इस अनूठी कोशिश से कला जगत में हड़कंप मंच गया। मचता भी क्यों नहीं, क्योंकि फिदा एक नए आइडिया के साथ आये थे। लेकिन हिंदु देवी देवताओं के साथ उनका प्रयोग उनको भारी पड़ गया। उन्हें देश के बाहर भी जाना पड़ा और देश के लोगों की भर्त्सना भी सहन करनी पड़ी। इस बार फिर फिदा हिंदुओं की भावनाओं से खेलने की कोशिश में है। इस बार वह कैनवास पर महाभारत उकेर रहे हैं। कहना गलत नहीं होगा अगर कैनवास पर उन्होंने किरदारों के साथ न्याय नहीं किया तो ये महाभारत अंतिम युद्ध होगा।
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