Wednesday, July 7, 2010

आम नहीं रहा आम आदमी का फल


“आम” आज आम आदमी का फल नहीं रहा, लेकिन फिर भी “आम” आम है। गरीब अमीर हर कोई आम का मुरीद है।
आम की तारीफ में मलीहाबाद में जन्मे क्रान्तिकारी शायर जोश मलीहाबादी हिन्दुस्तान छोड़ते समय मलीहाबाद के आमों को याद करते हुए कहा था।
आम के बागों में जब बरसात होगी पुरखरोश
मेरी फुरकत में लहू रोएगी चश्मे मय फरामोश
रस की बूदें जब उड़ा देंगी गुलिस्तानों के होश
कुंज-ए-रंगी में पुकारेंगी हवांए जोश-जोश
सुन के मेरा नाम मौसम गम जदा हो जाएगा
एक महशर सा महफिल में गुलिस्तांये बयां हो जाएगा
ए मलीहाबाद के रंगीं गुलिस्तां अलविदा।
जोश मलीहाबादी ने आम की तारीफ में जो शब्द कहें वह आम के साथ ऐसे जुड़े हैं कि आम की जब कभी भी बात होती है तो जोश मलीहाबादी की बात जरूर होती है। जोश साहब को आम बहुत प्रिय थे। आम क्योंकि फल ही ऐसा है कि वह किसी की नापसंद भी नहीं हो सकता। इसका एक छोटा सा उदाहरण मुल्ला नसरुद्दीन की एक छोटी सी कहानी से मिलता है। एक बार मुल्ला नसरुद्दीन ने अपने यहां आम की दावत रखी। उन्होंने अपने कुछ दोस्तों को बुलाया। उनमें से एक दोस्त मुल्ला से चिढ़ता था। उसने आम की दावत का मजाक उड़ाते हुए कहा कि देखों मुल्ला तुम्हारे ये आम तो तुम्हारा गधा भी नहीं खाता। मुल्ला ने तुरंत जवाब देते हुए कहा कि हां भाई तुम ठीक कहते हो गधे आम नहीं खाते। मुल्ला की बात सुनकर उनका दोस्त झेप गया। मुल्ला की बात ठीक ही है क्योंकि जो आम नहीं खाता वह गधे से क्या कम होगा। लेकिन आज आम खाना जिस कद्र आम आदमी की पहुंच से दूर होता जा रहा है। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि आज आम खाने के लिए साधारण आदमी को एक बार सोचना जरूर पड़ता है। मुझे अक्सर आज के दौर में आम खरीदने से पहले किसी शायर की वो लाइन जरूर याद आ जाती है।
अब मैं राशन की कतारों में.... नजर आता हूं।
अपने खेतों से जुदा...... होने की सजा पाता हूं।
बाजार से जब कभी घर को आता हूं।
अपने बच्चों के सामने खुद को शर्मिंदा पाता हूं।
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