Wednesday, July 7, 2010

मेरे साथ ही रहता है दुश्मन मेरा


मेरे साथ ही रहता है दुश्मन मेरा
हर पल हर सांस के साथ वह भी जीता है मेरे ही साथ
वह कहीं और नहीं.....रहता है मेरे ही दिल में।
वह बहता है मेरी रगो में लहु बनकर।
मेरा दुश्मन मेरी कहानी पर हर बार हंस दिया हर बार जीत गया।
कई बार कोशिश की के निकाल दूं इस लहु को
मार दूं इस दिल को
लेकिन हर बार उसी पुरानी कहानी ने मेरा दामन थामा
जिसमें एक विधवा पर हवस से भरी दुनिया की नजर थी
दो बच्चे थे जो चौराहे पर खड़े भीख मांगते दिखते थे।
फिर एक दिन एक कोशिश और की मैंने
दुश्मन को मारने की.....
मैंने ललकारा उसे
पूरी ताकत लगाकर पुकारा भी उसे
उसने जवाब मैं बस इतना ही कहा
मैं नहीं तेरा दुश्मन मैं तो वहीं हूं जिसे तू पालता आया बचपन से ही।
तूने ही जन्म दिया मुझे ईर्ष्या के रूप में।
मैं पलता रहा तेरे दिल में और एक दिन लहू बनकर बह चला तेरे शरीर में।
अब बात जब ललकार की आयी है तो चल ये भी कर लें।
तू मार दे मुझे या फिर बहने दे लहूं में इसी तरह।
सुनकर दुश्मन की बात लहु मेरा ठंडा से पड़ा।
एक कोशिश करने की और ताकत जोड़ने तक।
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