Thursday, April 15, 2010

अब बाबा किसके ?


इस देश में दलित एजेंडा वोट बैंक पर कितना हावी हो सकता है यह इस बार बाबा भीमराव अंबेडकर जयंती पर देखने को मिला। बीएसपी सुप्रीमो मायावती ने कांग्रेस को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि अगर कांग्रेस दलित महापुरूषों का सम्मान करती तो उनकी मूर्तियां और उनके नामों से बनने वाले पार्कों और स्मारकों का कार्य नहीं रूकवाती।
14 अप्रैल के दिन बाबा भीमराव अंबेडकर को याद करने पहुंचा दलित जनसमूह धूप में बैठकर ये सोच रहा था कि शायद इस बार बहन मायावती दलितों के उत्थान के लिए किसी योजना या फिर कोई ऐसा मसौदा पेश करेंगी जिससे उनका और राज्य के साथ देश का हित हो, लेकिन अब शायद मायावती जी ये भूल गयी हैं। उनका एक ही एजेंडा दिखाई देता है और वो है वोट बैंक को बनाये रखना। क्योंकि अब वह दलित और पिछड़ी नहीं हैं, बाल कटवा कर और कान, गले, नाक में हीरे के जेबर पहनकर वह दलितों को भी मुंह चिढ़ाने लगी हैं। उनके स्टाइल से ऐसा लगता है जैसे वह इंग्लैड की महारानी हैं और वह यहां देश के दलितों पर राज करने आयी हैं। ये कुछ दलितों को बुरा अवश्य लग सकता है, क्योंकि दलित उनसे बेपनाह प्रेम करता है और देश के प्रधानमंत्री के रूप में देखता है। लेकिन अब दलितों के नजरिये से मायावती दलितों की कम और कुर्सी की ज्यादा सोचती हैं। ये ठीक हो सकता है क्योंकि जब तक कुर्सी रहेगी तभी तक वह दलितों के लिए कुछ कर भी सकती हैं, लेकिन अब तो वह सत्ता में हैं। केन्द्र में दलित सरकार न सही, लेकिन राज्य में तो है। राज्य में अभी तक दलितों की हत्या हो रही हैं। दलितों के घर फूंके जा रहें हैं। अभी हाल का ही उदहारण लिया जाये तो ग्रेटर नोयडा में एक दलित को घोड़ी पर चढ़कर बरात नहीं ले जाने दी गई। पूर्वी उत्तर प्रदेश और पश्चमी उत्तर प्रदेश में दलितों की हालत में कोई बदलाव नहीं आया है। दलितों की मसीहा मायावती जी को ये बात पता नहीं कब समझ में आयेगी की दलितों को पार्क नहीं रोजगार और रोटी चाहिए। बाबा साहब ने कहा था कि जाओं जमीनों पर हल जोतो, सरकारी नौकरियां करो। उन्होंने कभी नहीं कहा कि मेरी मूर्ति लगाकर मेरी पूजा करना। उन्होंने कभी नहीं कहा मेरे नाम से पार्क बनवाओं, हां ये जरूर कहा की सभी दलित एक होकर राष्ट्र निर्माण में ज्यादा से ज्यादा सहयोग दो। राजनीति में प्रवेश करो और दलितों को सहयोग प्रदान करो। जबकि बीएसपी सुप्रीमो के यहां दलित कम और स्वर्ण ज्यादा काम करते हैं। उनका सलाहकारों में इका दुक्का ही दलित है। बेचारा दलित तो बहन जी के कानों में हीरे के कुंडल देखकर ही मन ही मन ये सोचता रह जावे हैं कि भाई बहन जी म्हारी अमीर हो ली, अब तेरी बारी है। लेकिन बहन जी को नोट और वोट इतने अच्छे लगते हैं कि वह इनसे बाहर ही निकलना नहीं चाहती।
खैर इस साल हमने सोचा बहनजी कोई आवास की या फिर रोजगार की योजना दलितों के लिए लायेंगी तो कुछ काम धंधा और घर मकान का सपना दलितों का पूरा होगा। चकबंदी और रोजगार पर कुछ बहनजी कहेंगी। लेकिन बहनजी ने तो सारा भाषण ही कांग्रेस के सर दे मारा। वहीं दूसरी ओर बाबा के नाम पर राहुल बाबा ने बाबा के समर्थन में जमकर कांग्रेस के दलित हित में किये गये कार्यों की विवेचना की। एक और बहन जी दूसरी ओर बाबा बीच में दलितों के मसीहा बाबा साहब अंबेडकर और उनके दलितों जनों के सपने। दोनों राजनीति की चक्की में इस तरह से पीसे की दोनों की आत्माएं एक साथ बोली की ‘अब बाबा किसके’?
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