Friday, March 19, 2010

खामोशी शोर मचाती है


मेरे जीवन में खामोशी शोर मचाती है।
मेरे कान झन्ना जाते हैं सर चकरा जाता है।
मेरे जीवन की खामोशी चीखचीख कर मुझे रूलाती है।
वह कहती है, आखिर क्यों हार गये तुम इस जीवन से।
तुम तो वही युवा थे जो दुनिया बदलने का मादा रखता था। हौसलें बुलंद थे तुम्हारे। फिर क्या हुआ। क्या तुम भी हार गये उनकी तरह जो जीतने के लिए चले तो थे लेकिन जीतने से पहले ही हार गये।
मेरे लाख जतन करने पर भी मेरे मन की खामोशी शांत नहीं होती। वह चीखती ही रही चिल्लाती ही रही।
फिर एक दिन खामोशी टूटी।
खामोशी बोली।
जीतना या हारना मेरे बस की बात नहीं।
वह नियती के हाथ है।
लेकिन ये सही है कि एक साया जो था मेरे साथ वह आज मेरे साथ नहीं है।
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