Thursday, February 25, 2010

कुर्सी प्रेम

पत्रकारिता में एक चीज जो पत्रकारों को बेहद प्यारी लगती है और जो कभी उनकी रहती भी नहीं है वह है कुर्सी। नौकरी लगते ही पत्रकारों को ये लगने लगता है कि अब इस कुर्सी पर उनका राज हो गया है। इस कुर्सी पर से वह तभी हटेंगे जब उनके पिछवाड़े लात मारकर नहीं हटाया जायेगा।
इसके अलावा कुर्सी से कुछ लोगों को इतना प्रेम हो जाता है कि वह अपने चैनल या अखबार के मालिक की अनाश शनाप बातों को स्वीकार करने के अलावा हर वह कार्य करते हैं जो पत्रकारिता के दायरे से बाहर है। जैसे हमारे बड़े भाई कहते है कि बीसीसीआई देश की सबसे ईमानदार संस्था है। कांग्रेस से अच्छी सरकार कोई नहीं हो सकती और देश को मनमोहन सिंह से अच्छा प्रधानमंत्री और राहुल से अच्छा युवा नेता नहीं मिल सकता। खैर ये तो हमारे बड़े भाई के विचार है। विचार तो किसी के भी किसी भी तरह के हो सकते हैं लेकिन विचार ही तो है जिनसे व्यक्तित्व की पहचान भी होती है। लेकिन हमने भाई से क्या लेना है क्योंकि वह नौकरी तो अपने देश के लोगों को ही देते हैं। चलिए, हम बात कर रहे थे कुर्सी प्रेम की, तो भला भाई का जिक्र क्यों। तो सुनिया साहब भाई को भी कुर्सी से बहुत प्रेम है। भाई पिछले 25 साल से भी ज्यादा समय से इस कुर्सी से चिपके हुए हैं और किसी को पास आने की बात तो दूर की है उसे देखने तक नहीं देते। मुझे तो कई बार लगा कि भाई मर गये तो इनकी कुर्सी को संभालेगा कौन क्योंकि भाई ने आजतक किसी को अपना दत्तक पुत्र घोषित नहीं किया, कहते हैं जो भी हूं मैं हूं। एक दिन किसी ने उनसे कह दिया कि साहब ऐसा भी क्या है इस कुर्सी में जो आप इसे छोड़े ही नहीं रहे, तो भाई बोले। यार........मेढ़क जब तक पोखर में रहता है जब तक पोखर का राजा होता है और जब वह समुन्द्र की ओर जाता है तो वह समुन्द्र में खो जाता है। ये बात मेरी आजतक समझ में नहीं आयी की वह कहना क्या चाहते थे। फिर मुझे लगा कि शायद उन्होंने इतना ज्ञान अर्जित कर लिया हो कि उन्हें और ज्यादा ज्ञान की आवश्यकता ही न हो। फिर लगा कि अगर ऐसा होता तो लोग बड़ी जगह जाकर ज्ञान क्यों अर्जित करते। क्यों ज्ञान अर्जित करने के लिए समुन्द्र मंथन करते। फिर मुझे लगा कि भाई शायद ठीक कह रहे हैं क्योंकि ये भी तो हो सकता है कि पोखर के मेढ़क का टर्रम टू शायद बड़ी शिकारी मछलियों को समझ में न आये। लेकिन इसका कुर्सी से प्रेम एक अजब कम्बीनेशन सा दिखाई दिया। खैर कुछ समय के बाद हमें समझ में आ गया कि बड़े भाई को मौजूदा संस्थान जितने आराम से मोटरकार, फ्लैट और ऐश दे सकता है वह कोई और नहीं देने वाला। इसलिए यहां का कुर्सी प्रेम ज्ञान अर्जन से ज्यादा इम्पोर्टेश रखता है। इसी तरह से पत्रकारिता में कुछ ऐसे लोग है जो साले कुर्सियों से ऐसे चिपके पड़े हैं जैसे भैंस की चुतोड़ों पर पिस्सू चिपक जाते हैं, सालों को जितना छुड़ाओं उतना ही भैसों के चुतड़ों में घुसे चले जाते हैं। ये साले पिस्सू मालिक नुमा भैस का खून पी पी कर मोटे हो रहे हैं और अपनी कुर्सी बचाने के लिए रिपोर्टर और छोटी तनख्वाह पर काम करने वाले लोगों की आये दिन छुट्टी कर देते हैं। साले ये इतने हरामजादे हैं कि अपनी तनख्वाह ये मालिकों से ये कहकर बढ़ावा लेते हैं कि देखिये साहब हमने कंपनी को इस बार इतना फायदा कर दिया। हमने इस साल तो चैनल पिछले साल के बजट से आधे में ही चला दिया। मालिकों को भी यहीं चाहिए होता है। उन्हें इस बात से मतलब ही नहीं होता कि ये साला पिस्सू पता नहीं कितनों का खून चूस रहा है। रही बात छोटे कर्मचारियों की तो उनकी बात भला कौन सुनेगा, क्योंकि इनकी बात सुनी तो फिर मालिक को मालिक कौन कहेगा। हमारे बड़े भाई का दावा है कि वह 10 लोगों का काम अकेले कर सकते हैं। एक दिन एक दिलजले ने कह दिया 10 का छोड़ों आप तो एक का ‘काम’ ही समझदारी से नहीं कर पाये। हालांकि ये बात भाई की समझ में नहीं आयी और न ही हमारे आयी और अगर हमारे आयी भी तो यहां नहीं आयेगी क्योंकि कुछ बाते ऐसी भी होती है जो कही नहीं जाती समझी जाती हैं।
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