Saturday, December 18, 2010

‘सेवा एवं समर्पण के 125 वर्ष’


कांग्रेस के नेता और कार्यकर्ता भले ही अपनी अध्यक्ष सोनिया गांधी के तारीफ में दिन रात कसीदे पढ़ते न थकते हों...और उनकी मौजूदगी को...पार्टी की परंपरा का मजबूत आधार मानते हों...लेकिन असल कहानी कुछ और ही है...आप ये बात सुनकर थोड़ा हैरान जरूर होंगे...लेकिन ये हकीकत है। हम आपको बताते हैं कि सोनिया की अध्यक्षता में कांग्रेस क्या वाकई परंपरा को निभा पा रही है। कांग्रेस में ये परंपरा रही है कि पार्टी के ब्लाक स्तर के कार्यकर्ताओं का सम्मेलन दो साल में एक बार हो...लेकिन सोनिया गांधी ने जब से पार्टी की कमान संभाली...ये अधिवेशन तीन साल में एक बार होना तय हुआ...लेकिन पार्टी इस परंपरा को कायम नहीं रख पाई...और पहली बार ऐसा हो रहा है कि...कांग्रेस का महाअधिवेश जो दिल्ली में चल रहा है....पांच साल बाद आयोजित किया जा रहा है। यही नहीं, पहली बार ऐसा होगा जब कार्यकर्ताओं के लिए आयोजित इस महाअधिवेश में पार्टी कार्यकर्ता ही अपनी ही पार्टी के बडे़ नेताओं से नहीं मिलेंगे। कांग्रेस महाधिवेशन की परंपरा रही है कि, पार्टी के बड़े नेता महाअधिवेश स्थल पर बडे़ मुद्दों की चर्चा पार्टी कार्यकर्ताओं से पहले सत्र में करें। लेकिन ये पहली बार होगा....जब बड़े नेता किसी भी कार्यकर्ता से बात नहीं करेंगे...यही नहीं सोनियां गांधी के अध्यक्ष रहते कांग्रेस की एक और परंपरा खत्म हो गई है...पीसीसी, एआईसीसी, और कांग्रेस की दूसरी बड़ी मिटिंग जो साल में तीन या चार बार हुआ करती थी...लगभग समाप्त हो चुकी हैं....हलांकि एक बार फिर कांग्रेस को मजबूत करने और कार्यकर्ताओं में नया उत्साह भरने के लिए.....सोनिया गांधी महाअधिवेश में भ्रष्टाचार, महंगाई, और दूसरे बड़े मद्दों को लेकर कांग्रेस कार्यकर्ताओं से मुखातिब होंगी.....लेकिन ये बात गौर करने वाली होगी कि....क्या सोनियां गांधी असल में कांग्रेस और उसकी परंपराओं को मजबूती प्रदान कर पाएंगी...वो भी तब जब कि सरकार को कई मुद्दों पर कार्यकर्ताओं को जवाब देना है।

Friday, November 26, 2010

दोस्त

कुछ तो रहा ही होगा उसके दिल में
रिश्तों में खटास यूं ही आया नहीं करती।

वक्त लगता है बीज को वृक्ष होने में
यूं ही कोई किसी को छाया दिया नहीं करता।

था वो सैंकड़ों लाखों परिंदों का घर
यूं ही कोई पेड़ काटकर किसी का घर उजाड़ा नहीं करता।

सीने में खंजर इस दुनिया में दुश्मन कहां उतारते हैं
अपने बनकर ही पीठ में खंजर अक्सर लोग उतारा करते हैं।

वो दोस्त ही था मेरा ऐसा वो अक्सर कहता था।
एक रोज उसने हाथ भी रखा था पार्थ किश्लय के सर पर
कहा था मेरी पत्नी को अपनी बहू भी खुले में....

फिर अचानक एक कहानी फिर खुद को दोहरा गई...
सुना थी जो बचपन में अपने पिता से मैंने कई बार

पिता जी कहते थे दो दोस्ती थी राजा और रंक के बीच
बड़ी अजीज

रहते न था एक दूसरे के बगैर

फिर एक दिन एक शैतान ने तोड़ी उनकी दोस्ती

फुसफुसाकर कान में गरीब के कुछ कहने का बहाना किया
अमीर देखता रहा.. पास आया और गरीब को उल्हाना दिया।
गरीब चाह कर भी सफाई में कुछ न कह पाया
अमीर का पारा आसमान पर चढ़ा
और दोस्ती जमीन पर निढाल पड़ी रह गई।

Monday, October 4, 2010

राम हो गये लीगल


अयोध्या पर आये फैसले के बाद भले ही देश के दो समुदाय सुप्रीम कोर्ट जाने का मन बना रहे हो, लेकिन भगवान राम को एक बात का आराम अवश्य ही हो गया होगा। और वो ये है कि अब राम लीगल हो गए हैं। यानी ये तो कम से कम तय हुआ कि अयोध्या में ही राम का जन्म हुआ था। चाहे वह आस्था के नाम पर हुआ या फिर किसी और आधार पर, लेकिन राम को अब ये आराम है कि वह इस देश में एक टुकड़े के कानूनी रूप से मालिक हो गए हैं। वैसे तो राम सभी के हैं और उनका निवास हर उस आदमी के दिल में है जो उनका स्मरण करता है। राम को किसी जमीन की भी आवश्यकता नहीं थी, लेकिन पिछले पांच सौ सालों से राम का जिस तरह से हिंदुओं के दिल से अस्तित्व मिटाने का कार्य हुआ उसके चलते ये आवश्यक हो चला था कि राम को जमीन मिले। दुनिया भर के कुछ बुद्धिजीवी लगातार इस बात की फिराक में थे कि वह राम का अस्तित्व मिटा दें। वह लगातार तर्क दे रहे थे कि राम मात्र एक कथा है राम एक सोच है। और इससे ज्यादा कुछ नहीं। यहां तक की राम को बदनाम करने के लिए ये तक कह दिया गया कि ये किसी छोटे से राज्य या प्रदेश की कोई छोटी मोटी कथा है जिसे गढ़ दिया गया है। बावजूद इसके राम इन सभी से ऊपर राम राज्य की स्थापना और प्रेम भाईचारे का संदेश देते रहे।
शांति के पथ पर चलते हुए राम हमेशा की तरह हर तरह की बुराईयों को मात देते हुए फिर एक बार विजयी हुए। राम को अधिकार भी मिला और उन्हें मानने वालों को ये परिणाम की राम सिर्फ एक विचार ही नहीं है वह एक ऐसी विरासत है जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक निरंतर आगे बढ़ती रहेगी और जब तक इस दुनिया का अस्तित्व रहेगा राम भी हमारे सांसों में रहेंगे।

Monday, September 27, 2010

दिल्ली का कोढ़ रंगीन पट्टियों में बंद


एक सर्वे के मुताबिक जो 2004-05 में हुआ था उसके मुताबिक दिल्ली में 635 middle schools, 2,515 primary schools, 1,208 senior secondary schools और 504 secondary schools हैं। दिल्ली के इन स्कूलों में तकरीबन 15 लाख विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण करते हैं।

इनमें प्राइवेट स्कूल शामिल नहीं हैं।

कॉमनवेल्थ गेम्स के दौरान दिल्ली के सभी स्कूल बंद रहेंगे और इनमें पढ़ने वाले बच्चे पूरे 15 दिन शिक्षा से वंचित रहेंगे। यहां सवाल ये उठता है कि आखिर खेलों के दौरान स्कूल बंद करने की क्या आवश्यकता थी। स्कूलों के बच्चों का इसमें क्या कसूर था कि वह स्कूल ही न जाए। पहले खेलों के मद्देनजर बच्चों के मध्य सालाना इम्तहान पहले हो गए। जबरदस्ती बच्चों को स्लैबस दो महीने पहले ही पढ़ा दिया गया।

दूसरा सवाल ये है कि सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे अधिकतर गरीब घरों से ताल्लुक रखते हैं। ऐसे में परिवार के लोग बच्चों को सरकारी स्कूलों में इसलिए भी भेजते हैं कि उन्हें वहां एक समय का अच्छा भोजन मिलता है जिससे उनके बच्चों की शिक्षा के साथ पालन पोषण ठीक हो रहा है। कम से कम बच्चों को पढ़ाई के साथ एक समय का भोजन तो मिल ही रहा है।

अब 15 दिन इन बच्चों को न तो भोजन ही मिलेगा और न ही शिक्षा। चलो ये भी मान लिया जाए कि अगर 15 दिन भोजन नहीं भी मिला तो क्या फर्क पड़ने वाला है, लेकिन पढ़ाई अगर समय पर नहीं हुई तो उसका असर तो पड़ेगा ही। अब यहां दिल्ली सरकार ये भी कह सकती है कि हम दिल्ली के शिक्षकों को सर्दियों में एक्सट्रा कक्षाएं लेने के लिए कहेंगे। चलो ठीक है सर्दियों में एक्सट्रा कक्षाएं हो जाएगी लेकिन क्या उससे पढ़ाई अपने ट्रेक पर आ जाएगी।

ठीक इसी तरह से दिल्ली मजदूरों को 15 दिन तक दिल्ली में फेरी करने पर रोक होगी। इसमें रिक्शा चालक, सब्जी विक्रेताओं और रेहड़ी वालों को 15 दिन घर में ही बंद रहना होगा। यानी की रोज कुंआ खोदकर पानी पीने वाले कॉमनवेल्थ गेम्स के दौरान या तो भूखे मरेंगे या फिर हर दिन पानी पी पीकर दिल्ली सरकार को कोसते रहेंगे। ठीक ऐसा ही दिल्ली के भीखारियों के साथ होने वाला है। दिल्ली के भीखारी 15 दिन सड़कों पर नहीं दिखाई देंगे। यानी कुल मिलाकर दिल्ली के कोढ़ सरकार रंगीन पट्टी लगाकर ढांप देना चाहती है।

Wednesday, September 22, 2010

गम ये नहीं दादी मर गई, डर ये है कि मौत घर देख गई

ये कहावत जब मैंने पहली बार अपने बॉस से एक मुद्दे पर सुनी तो सुनकर पहले तो में सन्न रह गया। कारण शायद ये था कि मेरे घर में मौत हुई थी और मैं उस मौत के गम से बाहर निकलने की कोशिश में था। लेकिन मौत घर देख गई। ये बात सुनकर मेरे एक बार को घुटने कांप गए। क्योंकि कहा जाता है मौत जब घर देख जाती है तो वापस मुढ़कर जरूर आती है।
मौत यूं तो एक सच्चाई है जिसका एक दिन सामना होना ही है। लेकिन मौत का ख्याल आते ही मन में कुछ सवाल तो उठते ही है। मरने वाला ये सोचकर खुश होता है कि चलो यार ये काम भी निपटा और जिंदा ये सोचकर खुश होता है कि चलो यार कुछ दिन औऱ। इसे खुशी कहे या गम, लेकिन ये दोनों ही दिलचस्प मामले हैं। मौत पर यूं तो इस दुनिया में जब से आदमी आया है तभी से वह कुछ न कुछ बोलता ही रहा है। किसी ने इसे अंतिम यात्रा बताया तो किसी ने इसे ही जीवन की शुरुआत कहा।
मेरे घर में मौत किसी शरीर की नहीं हुई थी, इसलिए भी शायद मैं थोड़ा ज्यादा सहम गया था। मेरे घर में मौत हुई थी मेरे अस्तित्व की, मेरे संघर्ष की और मेरे आत्मसम्मान की। मैं जिस संस्थान में कार्यरत था वहां से मुझे एक माह के लिए ये कहकर छुट्टी पर दे दी गई कि मेरी अभी दफ्तर में आवश्यकता नहीं है। लाख कोशिशें करने के बाद भी मैं इस असमायिक मौत को झेल नहीं पा रहा था। कारण चाहे कुछ भी रहा हो जिसमें ये पहला कारण हो सकता है कि मैं इस अचानक विपत्ति के लिए तैयार ही नहीं था। लेकिन विपत्ति आ गई तो मैं परेशान हो उठा। हालांकि मेरी संस्थान में वापसी भी हुई औऱ बहाली भी लेकिन मौत क्योंकि घर देख गई है तो ये सवाल मेरे मन से निकलने का नाम ही नहीं ले रहा था। फिर मेरे बॉस ने जिन्होंने मेरी कई आडे़ समय मदद भी की और मेरे आत्मसम्मान की रक्षा भी। उन्होंने एक बात कही कि यार मौत तय है। किसी का पहले और किसी का बाद में। नंबर सभी का आना है। आज हमारा तो कल तुम्हारी बारी है। लगी है कतार एक के बाद एक सभी की बारी है। ये सुनकर मुझे थोड़ा ढांढस तो बंधा साथ ही इस बात का अहसास भी हुआ कि आज के समय में हम हर दिन मौत से साक्षात्कार करते हैं। फर्क इतना है कभी हम जीत कर आते हैं और कभी हार कर।

सपनों के सौदागर



नोयडा एक्सटेंशन के नाम से धडल्ले से बिक रही है ग्रेटर नोयडा की जमीन। वहीं जमीन जिसपर ग्रेटर नोयडा प्राधिकरण और किसानों के बीच मामला अदालत में है। किसानों ने अभी तक इस जमीन पर प्राधिकरण को अधिकरण नहीं दिया है। वहीं दूसरी ओर प्रोपर्टी बाजार से जुड़े कारोबारी इस बात का जमकर फायदा उठा रहे हैं। वह ग्राहकों को बरगला रहे हैं और धोखे से उन्हें नोयडा एक्सटेंशन के नाम जमीन और फ्लैट बेच रहे हैं। इसका एक कारण ये भी है कि दिल्ली, गुड़गांव और बाहर के लोग जो दिल्ली के आसपास के इलाके में रहना चाहते हैं उनके लिए ग्रेटर नोयडा बेहद खुबसूरत इलाका है। प्रोपर्टी का काम करने वाले दलाल और बिल्डर इस बात को अच्छी तरह से जानते हैं और उन्हें इस बात का अंदाजा भी है कि ये बेहद बढ़िया लोकेशन है जहां आकार ग्राहक फंसता ही है।
इसी बात का फायदा उठाकर यहां के दलाल ग्राहकों को फंसा रहे हैं। वह नये नये प्रोजेक्ट ग्राहकों को दिखाते हैं उन्हें मंहगी गाड़ियों में लोकेशन पर लेकर जाते हैं और उन्हें गलत तरीके से जानकारी देकर पहले एक मुश्त बयाना राशी या फिर एडवांस बुकिंग के नाम पर मोटा पैसा ऐठते हैं। एक बार ग्राहक जब इनकी पहुंच में जाता है तो उसे निर्माण के लिए समय देते हैं। ये ग्राहकों से कहते हैं कि प्रोजेक्ट की कीमत एक हजार करोड़ रुपये हैं या छोटे दलाल कहते हैं कि प्रोजेक्ट की कीमत सौ करोड़ रुपये है। जैसे ही प्रोजेक्ट की कीमत हम बाजार से उठा लेंगे हम प्रोजेक्ट पर काम करना आरंभ कर देंगे। ये बहाना एक ऐसा बहाना है जिसका ओर है छोर है। क्योंकि ग्राहक कभी इस बात का अंदाजा ही नहीं लगा पाता कि उसके प्रोजेक्टर को कितना पैसा मिल गया है। ऐसे में ग्राहक अपने आपको ठगा से महसूस करता है और जब वह अपना पैसा वापस लेने की बात करता है तो या तो प्रोजेक्टर के ऑफिस पर ताला पाता है या फिर उसके फोन की घंटी तो बजती है लेकिन फिर कभी फोन उठता नहीं है।

Saturday, September 18, 2010

एक कलाकार का अंतिम युद्ध


देश के लिए कला के क्षेत्र में एक कैनवास देने वाला शख्स आज देश से बाहर महाभारत को चित्रों के माध्यम से कैनवास पर उतारने में व्यस्त है।
फिदा और फिदा का कैनवास इस बात पर कभी नहीं झगड़ते कि कैनवास पर उतर कर कौन आ रहा है। कलाकार के मन ने कहा कि चलो ये किया जाए और कलाकार अपनी कूची ब्रश के साथ कैनवास की शान में लकीरे खीचना आरंभ कर देता है।
एम एफ हुसैन को ये अंदाजा है कि महाभारत के कुछ किरदारों पर उनकी भर्त्सना हो सकती है। इसका कारण शायद ये भी हो कि एक कलाकार जब इतिहास के ब्रश से कैनवास पर उतारता है तो वह दिल और दिमाग से किरदार के साथ होता है। वह उस किरदार के साथ जीता है और मरता है। गजगमीनी हो या फिर फिदा के घोड़े। वह आजाद विचरण करते हैं। लेकिन कुछ कला को नहीं समझने वालों को इस बात से परेशानी हो सकती है कि भला किसी किरदार में कलाकार कैसे सांस ले सकता है।
एम एफ हुसैन जब देश में थे तो लोगों को उनके होने या नहीं होने का मतलब मालूम नहीं था। देश के कुछ प्रगतिशील विचारकों को अचानक ही हुसैन की याद तब आयी जब हुसैन को देश में एक पहचान मिलनी आरंभ हुई। उनके द्वारा बनाई गई होली की पेंटिग अनूठी थी। लोगों को इस बात का शायद ही अंदाजा था कि बगैर ब्रश के लिए कैनवास पर रंगों को और प्राकृतिक रूप से पैदा हुई भावनाओं को उकेरा जा सकता है। वह होली के दिन रिक्शे पर सवार हुए और देश के गलियों में धूमने लगे। जिस किसी ने भी उनपर रंग डाला उन्होंने कैनवास को आगे कर दिया। और फिर कैनवास पर वह उतरा जिसे शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता। उनकी इस अनूठी कोशिश से कला जगत में हड़कंप मंच गया। मचता भी क्यों नहीं, क्योंकि फिदा एक नए आइडिया के साथ आये थे। लेकिन हिंदु देवी देवताओं के साथ उनका प्रयोग उनको भारी पड़ गया। उन्हें देश के बाहर भी जाना पड़ा और देश के लोगों की भर्त्सना भी सहन करनी पड़ी। इस बार फिर फिदा हिंदुओं की भावनाओं से खेलने की कोशिश में है। इस बार वह कैनवास पर महाभारत उकेर रहे हैं। कहना गलत नहीं होगा अगर कैनवास पर उन्होंने किरदारों के साथ न्याय नहीं किया तो ये महाभारत अंतिम युद्ध होगा।

Saturday, July 24, 2010

फिर कोई महाभारत क्यों नहीं होता



फिर से कोई महाभारत क्यों नहीं होता
इस देश में फिर से कोई अर्जुन पैदा क्यों नहीं होता....
सुना था “जब जब पाप बढ़ेगा धरती पर लूंगा जन्म में”
चीर हरण द्रोपदी का हो रहा चौराहे पर
धर्म पड़ा है सड़कों पर
पिस रही है मानवता भूख की चक्की में
सुलग रही है आग दिल के जज्बातों में
फिर क्यों कोई कृष्ण पैदा नहीं होता
बूझती आंखों से पड़ा भीष्म
शरशैय्या पर
क्यों कोई धर्मराज
टूटती सांस को नहीं संभालता

Wednesday, July 21, 2010

पीछे छुटते सवाल


चार महीनें और तीन मौत की खबरें
हर मौत पीछे छोड़ती कुछ सवाल?
किस माहौल में जी रहे हैं हम।
खबरों के पीछे दौड़ते हम क्यों बन रहे हैं खबर
काम का दवाब, प्रतिस्पार्धा में बने रहने की फ्रिक
और पत्रकारिता में मौजूदगी की जद्दोजहद।
एक साथ मिलते हैं तो होता है डिप्रेशन
जो कभी दिमाग को फाड़ देता है
तो कभी दिल को।
लेकिन फिर भी रहना तो यहीं हैं।
अपने सबसे प्यारे दुश्मन के साथ
जो चलता है एक कदम आगे
कभी करता है चुगली बॉस से
तो कभी हम साया होकर
उतार देता है नस्तर जिगर में।
नहीं है किसी के पास वक्त भरोसे का...
हर शख्स है परेशान यहां थोड़ा थोड़ा।

Wednesday, July 7, 2010

आम नहीं रहा आम आदमी का फल


“आम” आज आम आदमी का फल नहीं रहा, लेकिन फिर भी “आम” आम है। गरीब अमीर हर कोई आम का मुरीद है।
आम की तारीफ में मलीहाबाद में जन्मे क्रान्तिकारी शायर जोश मलीहाबादी हिन्दुस्तान छोड़ते समय मलीहाबाद के आमों को याद करते हुए कहा था।
आम के बागों में जब बरसात होगी पुरखरोश
मेरी फुरकत में लहू रोएगी चश्मे मय फरामोश
रस की बूदें जब उड़ा देंगी गुलिस्तानों के होश
कुंज-ए-रंगी में पुकारेंगी हवांए जोश-जोश
सुन के मेरा नाम मौसम गम जदा हो जाएगा
एक महशर सा महफिल में गुलिस्तांये बयां हो जाएगा
ए मलीहाबाद के रंगीं गुलिस्तां अलविदा।
जोश मलीहाबादी ने आम की तारीफ में जो शब्द कहें वह आम के साथ ऐसे जुड़े हैं कि आम की जब कभी भी बात होती है तो जोश मलीहाबादी की बात जरूर होती है। जोश साहब को आम बहुत प्रिय थे। आम क्योंकि फल ही ऐसा है कि वह किसी की नापसंद भी नहीं हो सकता। इसका एक छोटा सा उदाहरण मुल्ला नसरुद्दीन की एक छोटी सी कहानी से मिलता है। एक बार मुल्ला नसरुद्दीन ने अपने यहां आम की दावत रखी। उन्होंने अपने कुछ दोस्तों को बुलाया। उनमें से एक दोस्त मुल्ला से चिढ़ता था। उसने आम की दावत का मजाक उड़ाते हुए कहा कि देखों मुल्ला तुम्हारे ये आम तो तुम्हारा गधा भी नहीं खाता। मुल्ला ने तुरंत जवाब देते हुए कहा कि हां भाई तुम ठीक कहते हो गधे आम नहीं खाते। मुल्ला की बात सुनकर उनका दोस्त झेप गया। मुल्ला की बात ठीक ही है क्योंकि जो आम नहीं खाता वह गधे से क्या कम होगा। लेकिन आज आम खाना जिस कद्र आम आदमी की पहुंच से दूर होता जा रहा है। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि आज आम खाने के लिए साधारण आदमी को एक बार सोचना जरूर पड़ता है। मुझे अक्सर आज के दौर में आम खरीदने से पहले किसी शायर की वो लाइन जरूर याद आ जाती है।
अब मैं राशन की कतारों में.... नजर आता हूं।
अपने खेतों से जुदा...... होने की सजा पाता हूं।
बाजार से जब कभी घर को आता हूं।
अपने बच्चों के सामने खुद को शर्मिंदा पाता हूं।

मेरे साथ ही रहता है दुश्मन मेरा


मेरे साथ ही रहता है दुश्मन मेरा
हर पल हर सांस के साथ वह भी जीता है मेरे ही साथ
वह कहीं और नहीं.....रहता है मेरे ही दिल में।
वह बहता है मेरी रगो में लहु बनकर।
मेरा दुश्मन मेरी कहानी पर हर बार हंस दिया हर बार जीत गया।
कई बार कोशिश की के निकाल दूं इस लहु को
मार दूं इस दिल को
लेकिन हर बार उसी पुरानी कहानी ने मेरा दामन थामा
जिसमें एक विधवा पर हवस से भरी दुनिया की नजर थी
दो बच्चे थे जो चौराहे पर खड़े भीख मांगते दिखते थे।
फिर एक दिन एक कोशिश और की मैंने
दुश्मन को मारने की.....
मैंने ललकारा उसे
पूरी ताकत लगाकर पुकारा भी उसे
उसने जवाब मैं बस इतना ही कहा
मैं नहीं तेरा दुश्मन मैं तो वहीं हूं जिसे तू पालता आया बचपन से ही।
तूने ही जन्म दिया मुझे ईर्ष्या के रूप में।
मैं पलता रहा तेरे दिल में और एक दिन लहू बनकर बह चला तेरे शरीर में।
अब बात जब ललकार की आयी है तो चल ये भी कर लें।
तू मार दे मुझे या फिर बहने दे लहूं में इसी तरह।
सुनकर दुश्मन की बात लहु मेरा ठंडा से पड़ा।
एक कोशिश करने की और ताकत जोड़ने तक।

Saturday, June 19, 2010

कब आएंगे मेरे द्वापर के कृष्ण

एक दोस्त था मेरा कहता था सुख दुख का साथी हूं मैं तेरा

रहता था कृष्ण की तरह वह भी द्वाराका में एक राजा की तरह

थे उसके भी कई द्वारपाल और सिपहेसलार।

रहता था हमेशा एक नशे में वो

कहता सभी को था वो चोर

सुनता नहीं जो उसकी बात था

उसके लिए वहीं सबसे बड़ा गुनहगार था।

एक दिन अचानक मैं ये सोचकर उसके दरवाजे चला गया

कि है अगर वो कृष्ण तो मैं भी सुदामा हूं।

रखेगा वो मेरी उस भूल को ठोकर पर

जिसके लिए मैं कई जन्मों से शर्मसार हूं।

द्वार पहुंचा सुदामा... हुआ आदार सत्कार

भूल गया सुदामा अपने गुनाह।

कृष्ण ने सुदामा को पहले लगाया गले

और कुछ याद आते ही

शिशुपाल सा गरजा वो

देता रहा गालिया किया 100 का भी आंकड़ा पार

सुनता रहा सुदामा और मुस्कुराता रहा

रोता रहा मन ही मन और कोसता रहा

अपने आप को, अपने भाग्य को

कि क्यों भूल गया वो कि अभी नहीं आये हैं द्वापर के कृष्ण

जो सुदामा की भूल को भूल जाते और लगा लेते गले

दोस्ती निभाते, मेरे दुखों को हरते और मेरा जहर अपने प्यार से धो डालते।

लौटा सुदामा फिर अपनी कुटियां में

टकटकी लगा देखता रहा अपने भूखे नंगे बच्चों को कई घंटे

और सोचता रहा कि कब आयेंगे मेरे द्वापर के कृष्ण... कब आएंगे मेरे द्वापर के कृष्ण।

Friday, June 18, 2010

‘दूसरों को शिक्षा दे और अपनी खाट भीतरी ले’




फेसबुक पर एक So Called पत्रकार द्वारा अपने पेज पर एक पार्टी के कुछ फोटोज ने अचानक ही मुझे झकझोर दिया। इस फोटो में देश के कुछ नामी पत्रकार हाथ में दारू के गिलास लिए किसी बात पर ठहका लगा रहे हैं। पहले मुझे लगा कि शायद ये मेरी आंखों को धोखा है क्योंकि इनमें से कुछ पत्रकार तो ऐसे हैं जो अपने आपको इस देश का नहीं दुनिया में सबसे ईमानदार आदमी कहते हैं।

ये टेलिविजन स्क्रीन पर अपने आपको देश का ऐसा नागरिक दिखाते है जो रिस्पॉनसेविल के साथ-साथ ऐसा व्यक्ति है जिसका काम ही देश की सेवा करना है। लेकिन जैसा हर बार होता है हर सिक्के के दो पहलू होते हैं। एक वो जो दिखाई देता है और एक वो जो हमें दिखाई नहीं देता। असल में साधारण लोगों को शायद पता नहीं होगा कि देश के अधिकतर पत्रकार नंबर एक के दारूबाज और लड़की बाज होते हैं।

देश के अधिकतर बड़े पत्रकारों के लड़कीबाजी के किस्से आए दिन हम लोग डिस्कस करते हैं। अपनी पहली बीबीयों से ये कई बार मार खा चुके हैं और दूसरी के चक्कर में आकार जपानी तेल और मद्रासी जैल टाइप दवाओं पर अपनी तनख्वाह का एक बड़ा हिस्सा खर्च कर चुके होते हैं। इस बात पर हमारे देश के कुछ पत्रकार भाईयों की आंख भौह टेढ़ी हो सकती हैं, लेकिन असलियत यही है। यहां अगर मैं अपने भाईयों की पोल खोलने लग जाऊं तो हो सकता है कि मेरा ब्लॉग तक ये लोग बंद करवा दे लेकिन जब बात चली है तो दूर तक तो जानी ही चाहिए। हालांकि कुछ भाई ये भी कह सकते हैं कि ये इनका प्राइवेट मामला है। अरे भाई इन सालों का ये प्राइवेट मामला है और जो ये.......देश के नेताओं को लेकर स्क्रीन पर आकार पूरे दिन भौंकते हैं तो वो क्या होता है। इनका ये कैसे नीजि मामला हो सकता है। इनका सरोकार देश से जुडा़ है। ये लोग देश के चौथे स्तंभ हैं। इनका कोई भी मामला देश की आम जनता को प्रभावित करता है। लेकिन ये लोग कभी अपने गिरेवान में नहीं झांकने वाले। मुझे इस बात की इनसे शिकायत नहीं है कि ये लोग दारू पीकर क्यों अपना गला तर कर रहे हैं, मुझे कोफ्त होती ये देखकर कि ये वही लोग है जो दूसरों को सीख देते हैं। एक कहावत पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बहुत प्रचलित है। शायद यहां कुछ बड़े बिहारी पत्रकारों को ये समझ में न आए लेकिन अगर वो हिंदी जानते हैं तो मतलब तो जरूर ही निकाल लेंगे।



कहावत है दूसरों को शिक्षा दे और अपनी खाट भीतरी ले

Thursday, June 10, 2010

जमीर बेच कर हासिल की है दो गज जमीन

दो प्रोपर्टी डीलर कब्रिस्तान के पास आपस में बात कर रहे थे।
एक बोला दूसरे से यार हम से तो ये मुर्दें भले हैं
कम से कम ढाई बाई छह के प्लाट में तो पड़े हैं।

हम दूसरो को प्लॉट मकान दिलवाते हैं
और खुद किराए के मकान में रहते हैं।

इतने में ही एक जलजला उठा
और एक कब्र में से एक मुर्दा उठा

मुर्दा देखकर पहले डीलर घबरा गए
और फिर सहमकर बोले हम से क्या कोई गलती हो गयी
जो आप इतने खफा हो गए
अपना आराम और प्लॉट छोड़कर हमारे पास आ गए
मुर्दा पहले मुस्कुराया और सर पर हाथ रखकर
गंभीर होकर बोला
यार तुम इतना क्यों घबरा रहे हो
मैं तो सफाई देने आया हूं
तुम जिसे मेरा प्लॉट समझ रहे हो
और मुझे बड़ा ही भाग्यवान के रूप में देख रहे हो
असल में ये प्लॉट तो मैंने अपना जमीर देकर कमाया है
प्लॉट पाने के लिए पहले अपनों को धोखा दिया
और फिर खुद धोखा खाया है।
वो तो भला हो उस आंतकबादी का
जिसने मुझे गोलियों से भून दिया
और सरकार ने शहीद के रूप में मेरे परिवार को मुआवजा दे दिया
नहीं तो मेरे बच्चें तो मेरी पेंशन पहले ही खा गए थे
बचा तो घर वो बांट चूके थे।
मैंने मरने से पहले अपना जमीर बेच दिया
अंतिम सांस लेने से पहले खुद का फकीर कह दिया।

Tuesday, June 1, 2010

क्यों बदले रिश्ते ?


अब तक मैं सोचता था खून ही खून के काम आता है।
सुनी थी एक कहानी
अपना मारे छांव में डाले

लेकिन बदलते जीवन के परिवेश और रिश्तों के समीकरणों ने
ढाह दी है हर दीवार उस सोच की, जो मिली थी विरासत में।

क्या हुआ कैसे हुआ पता नहीं,
बदल गया सब कुछ
बचपन की कहानी
बचपन के रिश्ते।
अब बहन राखी पर मेरी कलाई पर कलावा नहीं बांधती।
न ही भैया दूज पर तिलक ही करती।
पिता भी दशहरे पर जलेवी नहीं लाते।
मां तो कभी की रूठ चुकी थी।
है उसे शिकायत की मैं अब उसका बेटा नहीं रहा।
कहती है मैं अब किसी का पति हूं, बाप हूं।
भाई भी नहीं मिलता मुझे अब कभी।
सुना है रहता है वह भी इसी शहर के किसी फ्लैट में।

मुझे याद नहीं, मैंने अंतिम बार कब देखा था अपनी मां के जन्में उस भाई को जो रहता रहता था मेरे ही साथ मेरा साया बनकर।
कैसे अलग हो गया वह
मैंने तो बस यही कहा था उसे कि घर बड़ा हो गया है उसने फिर क्या सोचकर घर ही ढाह दिया।
कहता था नया घर बनाएंगे।
लेकिन जमीन और जमीर का सौदा कर वह इस शहर में कही खो गया।
मैं रोज उसे खोजता हूं लंबी काली सड़कों पर लेकिन नहीं दिखता वो मुझे इस भीड़ में।

Saturday, May 29, 2010

नक्सलियों का कहर


गुरुवार देर रात नक्सलियों ने ट्रेन पर हमला कर करीब 65 लोगों को मौत के घाट उतार दिया। इस हमले में 200 से ज्यादा लोग घायल भी हुए हैं। बम धमाका कुर्ला ज्ञानेश्वरी सुपर डीलक्स एक्सप्रेस की पटरी पर किया गया, जिससे इंजन समेत 12 डिब्बे पटरी से उतर गए। आइए जानते हैं नक्सलियों ने कब और कहां किस तरह हमले को अंजाम दिया है।

तमाम अभियानों के बावजूद नक्सलियों का कहर लगातार बढ़ता ही जा रहा है। हावड़ा - कुर्ला ज्ञानेश्वरी सुपर डीलक्स एक्सप्रेस को निशाना बनाकर नक्सलियों ने सरकार को फिर से खुली चुनौती दे डाली है। इस घटना की जिम्मेदारी नक्सल समर्थक संगठन पीसीपीए ने ली है। ये कोई पहली बार नहीं हुआ है जब नक्सलियों ने ट्रेनों को अपना निशाना बनाया हो...इससे पहले भी पश्चिम बंगाल, झारखंड और बिहार में नक्सलियों ने ट्रेनों को निशाना बनाया है...आइए एक नजर डालते हैं नक्सलियों के ट्रेनों पर किए गए हमलों पर.....

22 अप्रैल 2006

माओवादियों ने लातेहार में आठ घंटे तक एक यात्री ट्रेन को कब्जे में रखा।

मई 2008

माओवादियों ने लातेहार में पांच घंटे तक एक ट्रेन पर कब्जा किया।

27 अक्तूबर 2009

माओवादियों ने पीपुल्स कमेटी अगेंस्ट पुलिस एट्रोसिटीज की ओर से बुलाए गए बंद के दौरान भुवनेश्वर-नई दिल्ली राजधानी एक्सप्रेस को आठ घंटे तक कब्जे में रखा।

नवंबर 2009

माओवादियों ने झारखंड के सिमदेगा जिले में रेल पटरियों पर विस्फोट किया। एक यात्री ट्रेन पटरी से उतरी जिसमें दो लोगों की मौत हुई और 38 लोग जख्मी हुए।

19 मई 2010

माओवादियों ने पश्चिमी मिदनापुर जिले के झारग्राम के पास पटरियों पर बारूदी सुरंग से विस्फोट किया। एक मालगाड़ी के दो चालक जख्मी हुए और इंजन क्षतिग्रस्त हुआ।

ये वो हमले थे जिनमें ज्यादा जानमाल का नुक्सान नहीं हुआ था। लेकिन इस बार माओवादियों ने बड़े हमले को अंजाम देते हुए करीब 65 लोगों की जान ले ली। एक तरह से नक्सलियों ने सरकार के सख्त अभियान को ठेंगा दिखा दिया है। सरकार भले ही नक्सलियों से सख्ती से निपटने के दावे करे, लेकिन उनकी ताकत बढ़ती ही जा रही है। जो नक्सली कल तक आम आदमी की बेहतरी की बात करते थे अब वही नक्सली आम लोगों को ही मार रहे हैं। कहना गलत नहीं होगा कि नक्सली अब आतंकियों का दूसरा नाम बन चुके हैं।

Tuesday, May 25, 2010

खाप और गौत्र के बीच सियासत


हरियाणा, राजस्थान वेस्टर्न यूपी की राजनीति को गोत्र और खापों से अलग करके देखा ही नहीं जा सकता। इन क्षेत्रों में खाप पंचायत के फैसले के विपक्ष में जाने का मतलब जान से हाथ धोना भी है। अधिकतर मामलों में खाप पंचायत समगोत्र विवाह और प्रेम विवाह जो एक ही गांव में हुआ हो के खिलाफ हैं। केन्द्र सरकार ने खाप पंचायतों को झटका देते हुए हिंदु मैरिज एक्ट में संशोधन करने से इंकार किया है। सरकार का कहना है कि हिंदू मैरिज एक्ट अपने आप में एक परफेक्ट एक्ट है जिसमें अभी बदलाव करने की आवश्यकता नहीं है। एक साक्षात्कार में केन्द्रीय कानून मंत्री वीरप्पा मोइली ने मुखर हो रही खाप पंचायातों पर कहा है कि किसी भी हाल में गोत्र के आधार पर ओनर किलिंग और बर्बरतापूर्ण फैसलों को कानूनी रूप से मान्य नहीं माना जाएगा। अगर खाप पंचायातों के फैसलों पर नजर डाली जाये तो जब भी गाँव, जाति, गोत्र, परिवार की 'इज़्ज़त' के नाम पर होने वाली हत्याओं की बात होती है तो जाति पंचायत या खाप पंचायत का ज़िक्र बार-बार होता है । शादी के मामले में यदि खाप पंचायत को कोई आपत्ति हो तो वे युवक और युवती को अलग करने, शादी को रद्द करने, किसी परिवार का समाजाकि बहिष्कार करने या गाँव से निकाल देने और कुछ मामलों में तो युवक या युवती की हत्या तक का फ़ैसला करती है। लेकिन क्या है ये खाप पंचायत और देहात के समाज में इसका दबदबा क्यों कायम है? हमने इस विषय पर और जानकारी एकत्र कर आपके सामने प्रस्तुत की है। खाप पंचायतों का 'सम्मान' के नाम पर फ़ैसला लेने का सिलसिला कितना पुराना है? ऐसा चलन उत्तर भारत में ज़्यादा नज़र आता है. लेकिन ये कोई नई बात नहीं है. ये ख़ासे बहुत पुराने समय से चलता आया है। जैसे जैसे गाँव बसते गए वैसे-वैसे ऐसी रिवायतें बनतीं गई हैं। ये पारंपरिक पंचायतें हैं।
ये खाप पंचायतें हैं क्या? क्या इन्हें कोई आधिकारिक या प्रशासनिक स्वीकृति हासिल है? रिवायती पंचायतें कई तरह की होती हैं। खाप पंचायतें भी पारंपरिक पंचायते है जो आजकल काफ़ी उग्र नज़र आ रही हैं, लेकिन इन्हें कोई आधिकारिक मान्यता प्राप्त नहीं है। खाप पंचायतों में प्रभावशाली लोगों या गोत्र का दबदबा रहता है। साथ ही औरतें इसमें शामिल नहीं होती हैं, न उनका प्रतिनिधि होता है. ये केवल पुरुषों की पंचायत होती है और वहीं फ़ैसले लेते हैं. इसी तरह दलित या तो मौजूद ही नहीं होते और यदि होते भी हैं तो वे स्वतंत्र तौर पर अपनी बात किस हद तक रख सकते हैं, ये यहां कहने या लिखने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि खाप पंचायातें जाट और गुर्जर समूह के लोगों की होती है। युवा वर्ग को भी खाप पंचायत की बैठकों में बोलने का हक नहीं होता। कैसे होता है खाप पंचायातों का गठन एक गोत्र या फिर बिरादरी के सभी गोत्र मिलकर खाप पंचायत बनाते हैं। ये फिर पाँच गाँवों की हो सकती है या 20-25 गाँवों की भी हो सकती है. मेहम बहुत बड़ी खाप पंचायत और ऐसी और भी पंचायतें हैं। जो गोत्र जिस इलाक़े में ज़्यादा प्रभावशाली होता है, उसी का उस खाप पंचायत में ज़्यादा दबदबा होता है. कम जनसंख्या वाले गोत्र भी पंचायत में शामिल होते हैं लेकिन प्रभावशाली गोत्र की ही खाप पंचायत में चलती है. सभी गाँव निवासियों को बैठक में बुलाया जाता है, चाहे वे आएँ या न आएँ...और जो भी फ़ैसला लिया जाता है उसे सर्वसम्मति से लिया गया फ़ैसला बताया जाता है और ये सभी पर बाध्य होता है.। सबसे पहली खाप पंचायतें जाटों की थीं. विशेष तौर पर पंजाब-हरियाणा के देहाती इलाक़ों में जाटों के पास भूमि है, प्रशासन और राजनीति में इनका ख़ासा प्रभाव है, जनसंख्या भी काफ़ी ज़्यादा है। इन राज्यों में ये प्रभावशाली जाति है और इसीलिए इनका दबदबा भी है। खाप पंचायतों के लिए गए फ़ैसलों को कहाँ तक सर्वसम्मति से लिए गए फ़ैसले कहा जाए? लोकतंत्र के बाद जब सभी लोग समान हैं. इस हालात में यदि लड़का लड़की ख़ुद अपने फ़ैसले लें तो उन्हें क़ानून तौर पर अधिकार तो है लेकिन रिवायती तौर पर नहीं है। खाप पंचायतों में प्रभावशाली लोगों या गोत्र का दबदबा रहता है. साथ ही औरतें इसमें शामिल नहीं होती हैं, न उनका प्रतिनिधि होता है. ये केवल पुरुषों की पंचायत होती है और वहीं फ़ैसले लेते हैं। एक गाँव जहाँ पाँच गोत्र थे, आज वहाँ 15 या 20 गोत्र वाले लोग हैं. छोटे गाँव बड़े गाँव बन गए हैं. पुरानी पद्धति के अनुसार जातियों के बीच या गोत्रों के बीच संबंधों पर जो प्रतिबंध लगाए गए थे, उन्हें निभाना अब मुश्किल हो गया है। जब लड़कियों की जनसंख्या पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पहले से ही कम है और लड़कों की संख्या ज़्यादा है, तो समाज में तनाव पैदा होना स्वभाविक है। ये आधिकारिक तौर पर मान्यता प्राप्त पंचायतें नहीं हैं बल्कि पारंपरिक पंचायत हैं, इसलिए इसलिए आधुनिक भारत में यदि किसी वर्ग को असुरक्षा की भावना महसूस हो रही है या वह अपने घटते प्रभाव को लेकर चिंतित है तो वह है खाप पंचायत...इसीलिए खाप पंचायतें संवेदनशील और भावुक मुद्दों को उठाती हैं ताकि उन्हें आम लोगों का समर्थन प्राप्त हो सके और इसमें उन्हें कामयाबी भी मिलती है। पिछले कुछ वर्षों में जो किस्से सामने आए हैं वो केवल भागकर शादी करने के नहीं हैं. उनमें से अनेक मामले तो माता-पिता की रज़ामंदी के साथ शादी के भी है पर पंचायत ने गोत्र के आधार पर इन्हें नामंज़ूर कर दिया। खाप पंचायतों का रवैया तो ये है - 'छोरे तो हाथ से निकल गए, छोरियों को पकड़ कर रखो.' इसीलिए लड़कियाँ को ही परंपराओं, प्रतिष्ठा और सम्मान का बोझ ढोने का ज़रिया बना दिया गया है। ये बहुत विस्फोटक स्थिति है.
इस पूरे प्रकरण में प्रशासन और सरकार लाचार से क्यों नज़र आते हैं?
प्रशासन और सरकार में वहीं लोग बैठे हैं जो इसी समाज में पैदा और पले-बढ़े हैं. यदि वे समझते हैं कि उनके सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों को औरत को नियंत्रण में रखकर ही आगे बढ़ाया जा सकता है तो वे भी इन पंचायतों का विरोध नहीं करेंगे।
आधुनिकता और विकास के कई पैमाने हो सकते हैं लेकिन देहात में ये प्रगति जो आपको नज़र आ रही है, वो कई मायनों में सतही है। खतरनाक मोड़ पर खाप पंचायत पिछले कुछ समय से खाप पंचायतें सिर्फ दो वजहों से चर्चा में आई हैं। या तो किसी मुद्दे पर धरना या रास्ता जाम करने के लिए या फिर किसी प्रेमी जोड़े को सजा सुनाने के लिए। इधर वे फिर ऐसे ही कुछ कारणों से चर्चा में हैं। कुरुक्षेत्र में विभिन्न जातीय खापों ने एक स्वर में मनोज-बबली हत्याकांड के दोषियों से हमदर्दी जताते हुए अदालती फैसले की न केवल निंदा की है, बल्कि फांसी की सजा पाए लोगों का केस लड़ने के लिए हर घर से 10-10 रुपये जुटाकर हाई कोर्ट जाने का फैसला किया है। इसके अलावा उन्होंने एक ही गोत्र में शादी पर पाबंदी लगाने के लिए हिंदू मैरेज एक्ट 1955 में संशोधन करने की भी मांग की है। सरकार पर दबाव बनाने के लिए हरियाणा की सभी खापें राज्य में प्रस्तावित पंचायत चुनावों के बहिष्कार का मन भी बना रही हैं। खुद को सामाजिक-सांस्कृतिक परंपराओं का प्रहरी मानने वाली ये खाप पंचायतें समानांतर न्यायिक प्रक्रिया चलाने की कोशिश में हैं। ये अनेक कानूनों, कोर्ट के फैसलों और नए रिवाजों को अपनी संस्कृति पर एक बड़ा संकट मानते हुए उनके खिलाफ लामबंद होने लगी हैं।
ऋग्वेद में उल्लेख - सबसे पहले खापों का उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है। उस समय एक विशेष गोत्र के लोग मिलकर अपना एक चौधरी चुन लिया करते थे। एक खाप कई गांवों को मिलाकर बनती है और विभिन्न खापों को मिलाकर सर्वखाप बनती है। अब खाप के मुखिया का चयन चुनाव की बजाय वंशानुगत आधार पर होता है। यानी कि एक ही परिवार के लोग पीढ़ी दर पीढ़ी खाप के मुखिया बनते हैं। जातीय खापों का उद्भव भी बहुत पुराना है। मुगलों के शासन में खापों का प्रभाव इसलिए बढ़ा क्योंकि अर्थाभाव, आवागमन के साधनों की कमी और जागरूकता के अभाव के कारण गांव-समाज का हर व्यक्ति न्याय के लिए राजा के दरवाजे तक दौड़ नहीं लगा सकता था। अंग्रेजों से सहयोग
अंग्रेजी शासनकाल में भी यही व्यवस्था रही। अंग्रेजों ने भारत पर शासन करने की नीति के तहत खाप मुखियाओं की पीठ पर अपना हाथ रखा। प्रथम तथा द्वितीय महायुद्ध में दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान तथा पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गांवों से फौज में भीतर के मामलों में अधिकांश खाप मुखियाओं ने सक्रिय योगदान दिया। गांवों से अनाज तथा दूसरी वस्तुएं सौगात के रूप में अंग्रेज शासकों को मिलीं। प्रत्युत्तर में उन शासकों ने खाप और उसके मुखियाओं को जमीन-जागीरों से नवाजा। जिलों के डिप्टी कमिश्नरों के यहां और तहसीलों में अधिकांश खापों के मुखियाओं की खास खातिर होने लगी। इन संपर्कों के जरिए गांवों से स्वतंत्रता सेनानियों की गतिविधियों की सूचनाएं भी विदेशी शासन तक आसानी से पहुंचने लगीं। इस तरह ज्यादातर खाप अंग्रेजों की दास ही बनी रहीं। हालांकि कुछ ने स्वाधीनता आंदोलन में शामिल नेताओं को भी सहयोग दिया।
उस समय तक पेशावर से लेकर दिल्ली तक पंजाब था। पंजाब के क्षेत्र में मिसलों और आज के हरियाणा क्षेत्र में स्थित जातीय खापों विशेष रूप से जाट खापों ने सामाजिक क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किए। यही स्थिति पश्चिमी उत्तर प्रदेश और राजस्थान में रही। यहीं से खापों ने अपने सामाजिक दायित्व के साथ अपनी राजनीतिक शक्ति को भी पहचाना। 1967 के बाद जब भारतीय चुनावों पर जातीय रंग चढ़ने लगा, राजनीतिज्ञों ने खापों की ताकत को पहचाना और पाया कि खापों के चबूतरे पर हुक्का गुड़गुड़ाते मुखिया जो फैसला करते हैं उस पर एक नहीं बल्कि उनके अधीन 12 से लेकर 36 गांव तक अमल करते हैं। लोटे में नमक डाल कर कसम खाना बहुत बड़ी बात मानी जाने लगी। राजनेताओं ने जमकर इसका लाभ उठाना शुरू कर दिया। यहीं से खापें अपना सामाजिक दायित्व भूल कर सियासी भूमिका निभाने लगीं। राजनेताओं ने भी खाप मुखियाओं को पुरस्कृत करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। जब उन्होंने हाथ काट दो, गला रेत दो, गांव से निकाल दो, पत्नी को बहन मान लो जैसे मध्ययुगीन फैसले दिए, राजनीतिक नेतृत्व ने मौन रहना बेहतर समझा। इससे खापों का हौसला बढ़ा। इन दिनों खापों में जो हो रहा है, यह उसी का परिणाम है।
वोट की राजनीति
वोट की राजनीति के तहत खापों का खूब दोहन किया गया है। हरियाणा में सोनीपत, रोहतक, हिसार, भिवानी और जींद ऐसे जिले हैं, जहां खापों का सबसे अधिक प्रभाव है। इसी तरह पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मेरठ, मुजफ्फरनगर, बागपत आदि में खापों का बहुत अधिक प्रभाव है। वेस्टर्न यूपी में जाटों की प्राचीन खाप इस इक्कीसवीं सदी में भी सामाजिक-राजनीतिक सत्ता का केंद्र बनी हुई है। इसकी मिसाल 84 गावों वाली बालियान खाप के प्रमुख महेंद्र सिंह टिकैत के रूप में देखी जा सकती है, जिन्होंने एक समय बहुत बड़ा किसान आंदोलन चलाकर सत्ता को हिलाकर रख दिया था।

हरियाणा में महम चौबीसी भी इसी तरह की प्रभावशाली खाप है। यूं तो विभिन्न जातियों की खापें हैं लेकिन मौजूदा दौर में अगर किसी ने खाप के जरिए अपनी ताकत और हैसियत का अहसास करवाने की कोशिश की है तो वह है जाट समाज। इस इलाके के सियासी स्वरूप पर नजर डालें तो पश्चिमी उत्तर प्रदेश और हरियाणा की राजनीति में भी जाटों का ही वर्चस्व रहा है। यानी खाप और उसके पीछे खड़ा जनमानस वोट में तब्दील होकर सत्ताओं में भागीदारी करता आया है।

लेकिन इन खापों की समानांतर अदालतें और उनके मध्ययुगीन फैसले आज इंटरनेट और सूचना प्रौद्योगिकी के बल पर आगे बढ़ती दुनिया को मंजूर नहीं हैं। साफ बात है कि अगर राजनेता इन जातीय खापों को अपने वोटों की पेटी मानना छोड़ दें तो मामला पटरी पर आ सकता है। पानी सिर से निकलने को है। तत्काल कोई गंभीर कदम उठाने की जरूरत खाप पंचायातों के नाम पर सिकती राजनैतिक रोटियां मनोज बबली हत्याकांड में दोषियों को सजा होने के बाद चर्चा में आयी खाप पंचयात अब राजनीति का आखड़ा बनती जा रही है। जहां एक ओर खाप पंचायत इसे षडयंत्र मानकर इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में जाने का मन बना चुके हैं, वही अब खाप पंचायतों को लेकर हरियाणा, राजस्थान और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाट, गुर्जर बाहुल इलाकों में इन पंचायतों को देश के विभिन्न राजनैतिक दल अपने पक्ष में करने में जुटे है। हरियाणा की राजनीति में लगभग 35 फीसद भागीदारी रखने वाले जाट वोट बैंक को अपने कब्जें में करने के लिए हरियाणा मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा, हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला,, कांग्रेस के नवीन जिंदल जैसे दिग्गज नेता खाप पंचायतों को अपने पक्ष में लेने और खाप पंचायतों के साथ उनके समर्थकों की सहानुभुति लेने की होड़ मची गयी है। ठीक ऐसा ही राजस्थान और पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में हो रहा है। खाप पंचायतों को रिझाने के लिए देश की राजनैतिक पार्टियां इन्हें प्रलोभन दे रही है कि वह उनकी मांगों को पूरा करवाने में उनकी सहायता करेंगे। इस मामले पर अगर हाल के राजनेताओं के दौरों पर नजर डाली जाये तो खाप पंचायतों के हिंदू मैरिज एक्ट सहित अन्य मांगों को लेकर चलाए जा रहे आंदोलन में सांसद नवीन जिंदल ने खाप पंचायतों से उनकी मांगों का ज्ञापन लिया है जिसे उन्होंने केन्द्र की सरकार व कांग्रेस हाईकमान तक पहुंचाने का वायदा किया है। उन्होंने कहा है कि खाप पंचायत की भावनाओं को आलाकामन तक पहुंचाना उनका कर्तव्य है। हालांकि अब केन्द्रीय कानून मंत्री और गृह मंत्रालय से आयी टिप्पडि़यों के बाद नवीन जिंदल अपने वायदों पर सफाई देते नजर आ रहे हैं। वहीं खाप पंचायतों और उनके समर्थकों का कहना है कि कुछ भ्रमित युवक युवतियां पाश्चात्य संस्कृति से प्रेरित होकर सामाजिक परंपराओं के खिलाफ जा रहे हैं। रीति रिवाजों की सुरक्षा करना हमारा धर्म है। इसके लिए पूरे हरियाणा के सभी सांसदों, विधायकों एवं अन्य राजनीतिज्ञों से भी सहयोग की अपील की जाएगी। इस मांग को पूरा करवाने के लिए गांव स्तर पर इकाइयों का गठन होगा। खाप पंचायत के समर्थकों का ये भी कहना है कि हिंदू मैरिज एक्ट में संशोधन, समगोत्र में विवाह पर प्रतिबंध, मां के गोत्र में विवाह एवं सीमा के साथ लगते गांव में विवाह प्रतिबंध लगाना चाहिए। नवीन जिंदल ने सहमति जताते हुए कहा है, वे उनकी मांगों को सरकार और हाईकमान तक पहुंचाएंगे। खापों ने जो संस्कृति को बचाने का बीड़ा उठाया है वह प्रशंसनीय है। वह कानून के दायरे में रहकर खाप प्रतिनिधियों की हर संभव मदद करेंगे। उन्होंने खापों का आह्वान किया कि वे दहेज एवं भ्रूण हत्या के खिलाफ भी आवाज उठाएं तथा समाज का मार्गदर्शन करें। खाप प्रतिनिधियों ने राज्य के अन्य नौ सांसदों एवं दो राज्यसभा सदस्यों को 25 मई तक का अल्टीमेटम भी दिया है। जिसमें खापों ने कहा है कि अगर वह उनका समर्थन नहीं देंगे तो वह उनके खिलाफ आंदोलन छेड़ देंगे। दूसरी ओर भाजपा विधायक दल के नेता अनिल बिज ने कहा, आज नवीन जिंदल खाप पंचायतों की राजनीति में उतर आये हैं। वह पहले कहां थे ? चौटाला की राजनीति पर फिरा पानी खापों के मुद्दे पर पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला भी हाथ अजमाने में लगे हैं और खापों का समर्थन लेने की हर संभव कोशिश कर रहे हैं। खाप पंचायातों के समर्थन में खड़े होकर हरियाणा की राजनीति में जाटों को साथ लेने का दांव चलने वाले चौटाला को उस समय करारा झटका लगा जब केन्द्रिय गृह मंत्रालय ने पानी दिया। गृह मंत्रालय ने चौटाला की इस बात का पुरजोर विरोध करते हुए कहा कि गृह मंत्री पी. चिंदबरम से मुलाकात के दौरान चौटाला ने गोत्र के अंदर विवाह पर रोक लगाने के बारे में किसी प्रकार का कोई विचार- विमार्श किया था। गृह मंत्रालय के अनुसार ऐसी कोई भी चर्चा चिदंबरम और चौटाला के बीच नहीं हुई। जबकि हरियाणा में चौटाला ने खुलकर ये ऐलान किया था कि चिदंबरम से मुलाकात के दौरान उन्होंने खाप पंचायतों और गोत्र विवाह का मामला उठाया था। असल में चौटाला ये अच्छी तरह से जानते हैं कि हरियाणा में जाटों का वोट बैंक कितना बड़ा है। चौटाला के इस दांव से कांग्रेस में भी हलचल मची हुई थी। चौटाला ने यह भी कहा था कि जो लोग गोत्र विवाह औऱ खाप पंचायतों के मुद्दे का समर्थन कर रहे हैं उन सभी को एक साथ आना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा था कि गोत्र विवाह के संबंध में हरियाणा और कांग्रेस सरकार को एक विधेयक लाना चाहिए और उसका समर्थन इनेलो भी करेगा। एक प्रकार से चौटाला ने इस मुद्दे पर कांग्रेस को जाटों के बीच कटघरे में खड़ा करने की चाल चली थी। लेकिन कांग्रेस ने चौटाला की चाल को भांपकर उनकी चाल पर पानी फेरने में देर नहीं लगाई और साफ शब्दों में कहा कि चौटाला ने इस तरह की कोई भी बात गृह मंत्रालय से नहीं की है। इस संबंध में गृह मंत्रालय ने एक विज्ञप्ति जारी कर इस बात का खंडन किया कि चौटाला और गृह मंत्री के बीच गोत्र के अंदर विवाह करने और खाप पंचायातों के द्वारा लिए गए आंदोलन का फैसले पर उनकी कोई बात हुई है। इस पत्र में कहा गया है कि चौटाला और चिदंबरम के बीच 10 मई को जो मुलाकात हुई है वह हरियाणा के गृह राज्यमंत्री गोपाल कांडा से संबंधित है। चिदंबरम और चौटाला की मुलाकात में किसी भी अन्य मुद्दे पर बातचीत नहीं हुई।

Friday, April 16, 2010

सोशल नेटवर्किंग -2

आज मैं सोशल नेटवर्किंग भाग -2 आपक सामने रखने जा रहा हूं। कल इस कहानी का पहला भाग मैंने अपने ब्लाग पर दिया था। उसपर एक मित्र की प्रतिक्रिया ने मुझे इसके दूसरे भाग को लिखने की प्रेरणा दी है। कहानी वहीं पुरानी है। ये कहानी हमारी धार्मिक पुस्तकों और अक्सर घर के बुजुर्गों के माध्यम से सुनाई जाती रही है। इसके लेखक कौन हैं इसकी जानकारी मुझे नहीं हैं, लेकिन आप इस कहानी को पढ़कर ये अवश्य समझ पायेंगे कि ये मेरी पहली कहानी का आगे का हिस्सा है और क्योंकि मेरी पहली कहानी पर कल थोड़ी बहस हुई थी तो उसी बहस को आगे बढ़ाने के लिए ये दूसरी कहानी लिख रहा हूं।
हां, एक बात और मैं कहानी अपने तरह से कहने में विश्वास रखता हूं और साधारण शब्दों में कहता हूं इसलिए कहानी को थोड़ा तोड़ता मरोड़ता हूं। उम्मीद है आप मेरी इस गलती को माफ करके कहानी का आनंद अवश्य लेंगे।
बड़ा कौन ?

एक बार गणेश भगवान और उनके बड़े भाई कार्तिक खेल रहे थे। खेलते खेलते कोई बात चली और कार्तिक भगवान ने गणेश जी से कहा की तू मुझसे छोटा है, छोटे के तरह रहा कर। गणेश जी ने कहा भाई इस दुनिया में कोई बड़ा या छोटा नहीं है, जिसकी जितनी ज्यादा मांग इस दुनिया में है यानी जिसका सोशल नेटवर्क जितना बड़ा है वह उतना ही बड़ा है। यानी जिसकी ज्यादा पहुंच जिसका ज्यादा प्रचार वही महान। ये बात कार्तिक को बुरी लग गई। उन्होंने कहा अरे गणेश भाई कैसी बात करते हो। क्या आयु, शिक्षा और ज्ञान का आधार कुछ नहीं है। इसपर गणेश जी मुस्कुराये और बोले भाई में ज्ञान, आयु और शिक्षा की नहीं मैं तो सिर्फ ये कह रहा हूं कि जिसकी बाजार में जितनी मांग होगी वह उतना ही बड़ा होगा। जिसका सोशल नेटवर्क बड़ा होगा वह बड़ा होगा। अब धरती पर मौजूद हाल का ही उदहारण ले लीजिए। सानिया और शोहेब की शादी दंतेबाड़ा के नक्सली नरसंहार से बड़ी हो गई। हमारे यहां मौजूद यमदूत भी पहले सानिया के यहां दावत खाने पहुंचे औऱ बाद में दंतेबाड़ा पहुंचे। मीडिया ने भी जो नारद जी से भी तेज खबर देने का दावा करती है। वह भी पहले वहीं पहुंचे और दंतेबाड़ा पर चिंदबरम की बाइट चला कर अपना पल्ला झाड़ लिया। तो जो मार्किट में बिक रहा है और जिसका सोशल नेटवर्क ज्यादा है वह बड़ा हुआ या नहीं। इस पर कार्तिक का चेहरा तम तमा गया। वह गुस्सें में गये और जा पहुंचे सीधे हाई कमान भगवान शिव के पास और बोले पिता जी ये गणेश मुझसे कहता है कि मैं बड़ा नहीं ये बड़ा है। ऊपर से धरती के उल्टे सीधे तर्क दे रहा है। भोले नाथ ये बात सुनकर पहले चुप्पी साध गये, लेकिन कार्तिक कहा मानने वाले थे। उन्होंने उनकी बाजू पकड़ कर हिलाया और कहा पिता जी आप आंखे मत मूंदो और मुझे जवाब दो। भोले नाथ ने आंखे खोली और धीरे से कहा पुत्र आप लोगों का आपसी मामला है आप ही निपटा लो काहे मुझ योगी को इस लफड़े में डालते हो। कार्तिक फिर बोले पिता जी आप क्यों अपना पल्ला झाड़ रहे हो। मुझे जवाब चाहिए नहीं तो मैं आपका पीछा नहीं छोड़ने वाला। अब भोले नाथ समझ गये कि मामला कुछ ज्यादा ही सनसेटिव हो गया है। उन्होंने नंदी को आवाज देकर बुलाया और कहा जाओं गणेश को ले आओं। गणेश जी हाथ में अपना मोदक लिए भगवान शिव के दरवार में उपस्थित हो गये। भगवान शिव ने पूछा बेटा ये कार्तिक से आपका किस बात पर झगड़ा हो रहा है। इस पर गणेश पहले थोड़ा मुस्कुराये और फिर बोले। बाबा कार्तिक भाई को मैं समझा रहा था कि इस दुनिया में वही बडा़ है जिसका सोशल नेटवर्क बड़ा है। लेकिन ये भाई है कि मानते ही नहीं और कह रहे हैं मैं बड़ा हूं, क्योंकि मैं आयु में बड़ा हूं। अब मैंने इन्हें समझाया की आयु में तो बह्रमा भी बड़े हैं लेकिन उनका सोशल नेटवर्क स्ट्रोंग नहीं है तो उनका कोई नाम नहीं लेता और चाचा जी यानी विष्णु जी का सोशल नेटवर्क बड़ा है तो उनका नाम बड़ा हो गया उनकी डिमांड ज्यादा हो गयी। लेकिन ये मेरी बात को मानने के लिए ही तैयार नहीं है। इस पर फिर से कार्तिक भन्ना गये, उन्होंने आव देखा ना ताव औऱ गणेश को चैलेंज दे कर कहा। अच्छा तू बहुत देर से बक बक कर रहा है। चल तू मुझसे दौड़ लगा और साबित कर की तू मुझसे बड़ा है। जो जितेगा वही बड़ा होगा। ये सुनकर भगवान शिव के दरबार में मौजूद सभी देवतागण चुप हो गये। इस पर वहां मौजूद नंदी ने कहा भगवन आप काहे इस छोटे बड़े के चक्कर में फंस रहे हैं। छोड़िये और अपने मोर पर बैठकर आकाश की परिक्रमा कीजिए और आनंद लिजिए। गणेश जी का क्या है ये तो ऐसे ही कहते रहते हैं। लेकिन कार्तिक जी तो जैसे अपनी बात पर अड़े बैठे थे। उन्होंने जैसे ठान ही लिया था कि आज फैसला करना है औऱ गणेश को जवाब देना है। कार्तिक ने कहा नहीं आज दौड़ होगी मतलब दौड़ होगी। इसपर गणेश जी ने कहा भाई ठीक है अगर आप नहीं मानते तो मैं दौड़ लगाने के लिए तैयार हूं लेकिन तैयारी करने के लिए मुझे कुछ समय चाहिए। कार्तिक ने कहा दौड़ पूरे ब्राहमांड की लगानी होगी और जो पहले यहां वापस आयेगा वहीं विजयी होगा। गणेश जी ने बात मान ली और कहा ठीक है मुझे एक सप्ताह का समय दीजिए तैयारी के लिए। कार्तिक ने समय दे दिया। कार्तिक उसी समय से अपने मोर की सेवा में लग गये और लगे दंड मारने की अब ब्राहमांड विजयी करना है। वहीं दूसरी ओर गणेश जी सभी देवताओं से मंत्रणा करने लगे और सभी देवताओं, नर, नारी, पशु, पक्षी और इन तीनों लोको के प्राणियों को जमकर मौज करवाई, सभी के लिए मीठे मोदक और जिसकी जो पसंद थी वह पहुंचाया गया। भगवान शिव को भी भांग धत्तूरा और पार्वती जी को चंदन का खास उबटन दिया गया। एक सप्ताह तीनों लोकों में जश्न का माहौल रहा ऐसा लग रहा था कि भारत देश का लोकसभा का इलेक्शन हो रहा हो। दारू, मुर्गा, रैव पार्टी सभी कुछ हुआ। आखिर प्रतियोगिता का समय ही गया। प्रतियोगिता का निर्णय का हक भगवान शिव और पार्वती मां को दिया गया, लेकिन वोटिंग्स के आधार पर। वोट सभी देवी देवताओं औऱ तीनों लोकों के प्राणियों को करने का अधिकार दिया गया। वोट इंटरनेट औऱ मोबाइल के माध्यम या फिर एक ध्वनी मत के द्वारा दी जाने की घोषणा की गई। खैर प्रतिस्पर्धा आरंभ हुई। सीटी बजी और कार्तिक महाराज ने अपने मोर को ऐढ़ लगाई और चल दिये ब्राहमांड की सैर करने। जबकि गणेश जी वहीं रहे और भगवान शिव औऱ पार्वती की सेवा करते रहे और पूरे सप्ताह हर रोज उन्ही के सात सात चक्कर लगाने लगे। एक सप्ताह के बाद कार्तिक पसीना पसीना होते वापस आये और जैसे ही भगवान शिव के दरबार मे पहुंचे गणेश को वहीं पाकर जोर से हंसे और बोले देख मैं ब्राहमांड का एक चक्कर लगा कर भी गया और तू यहीं बैठा है। इतने में ही भगवान शिव के यहां मौजूद स्कोर बोर्ड़े पर डिस्प्ले हुआ कार्तिक - एक चक्कर, गणेश - 49
स्कोर देखकर कार्तिक का सर भन्ना गया और वहां मौजूद सारे दर्शकों ने अब गणेश को अपने कंधों पर उठा लिया और जोर से एक ध्वनी में कहा। हमारे विध्नहरता, कष्टहरता, दुख दूर करता कौन ? इतने में ही शिव पार्वती बोले भगवान गणेश।