Tuesday, September 19, 2017

एक लाख 72 हजार परिवारों पर योगी की चाबुक

एक लाख 72 हजार परिवारों पर योगी की चाबुक

एक लाख 72 हजार परिवार आज बेरोजगारी की मार झेल रहे हैं। बच्चें भूखे हैं और परिवार के मुखिया दिल्ली की सड़कों पर ये सोचकर धक्के खाने को मजबूर हैं कि शायद दिल्ली दरबार में उनकी सुनवाई हो जाए। कानपुर से दिल्ल आयी अंजना सिंह की उम्र 48 साल है और उनके तीन बच्चे हैं। दो लड़कियां हैं जिसमें से एक की शादी होने वाली है। अंजना अब रिटायरमेंट के करीब है और पिछले 17 साल से कानपुर देहात में शिक्षक मित्र है।


पिछले दो महीने से अंजना सिंह को तनख्वाह नहीं मिल रही है। योगी आदित्यनाथ की सरकार का फरमान है कि अब शिक्षक मित्रों की तनख्वाह रोक दी जाए क्योंकि सरकारी खजाने पर अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है। अंजना सिंह कहती हैं। मैं पिछले दो महीने से दर दर भटक रही हूं। मेरे साथ मेरे और भी साथी हैं जो कानपुर देहात से आए हैं। हमें दो महीने से तनख्वाह नहीं मिल रही है और नौकरी भी पक्की नहीं की जा रही है। मैं 17 साल से शिक्षक मित्र हूं और ग्रेजुएट के साथ बीआरटी भी हूं।

अंजना सिह की ही तरह कानपुर देहात से सीमा पाल भी आयी है। इन्हें भी बतौर शिक्षक मित्र ग्रामीण क्षेत्र में 17 साल हो चुके हैं। इन्हें भी दो महीने से तनख्वाह नहीं मिली है। घर की जिम्मेवारी अंजना सिंह के कांधे पर ही है। क्योंकि घर में कमाने वाली ये अकेली महिला हैं। पति मजदूर हैं और आमदनी कोई फिक्स नहीं है। ऐसे में दो महीने से घर में तनख्वाह नहीं आने का मतलब भूख और तंगहाली ही हो सकती है।
सीमा पाल, अंजना सिंह के दिल्ली में अगर आप लूटियन जोन से गुजरे तो जंतर मंतर और कनॉट प्लेस के आसपास आपको हजारों अंजना सिंह और सीमा पाल हाथों में झोले और पानी की बोतल लिए भटकते दिख जाएंगे। इनमें से कोई राम सिंह है तो कोई मलखान। कोई बरेली से है तो कोई आगरा से। यहां तक की गोरखपुर से भी रामशरण अपने परिवार के साथ दिल्ली में न्याय की आस लेकर पहुंचे हैं।  

फैजाबाद से आए श्यामवीर कहते हैं। 2014 में हमें रेग्यूलर अध्यापक की ही तरह 40 हजार रुपये महीना तनख्वाह मिलती थी। 2014 के बाद लगा कि शायद अब दिन सुधर गए हैं। और जल्द ही वो रेग्युलर शिक्षक के पद पर नियुक्त कर दिए जाएंगे। वो दिन रात देश का भविष्य रोशन करने में लगे रहे, बगैर इस बात की परवाह किए कि उनका भविष्य अधर में है।

हालांकि वो पिछली सरकार की बात करना भी नहीं भूलते। रामशरण कहते हैं कि समाजवादी पार्टी की सरकार के दौरान यानी 2014 में उन्हें 40 हजार रुपये महीना वेतन के रूप में दिया जाता था। उसी दौरान अखिलेश सरकार पर विपक्ष की सरकार ने दबाव डाला और मामला कोर्ट तक जा पहुंचा। इस बीच कोर्ट ने राज्य सरकार को आदेश देकर हमारी तनख्वाह रुकवा दी। जिसके बाद शिक्षक मित्रों को समायोजित करने अथवा रेग्युलर टीचर्स के तरह की नौकरी देने की बात की गयी। इसके लिए ग्रेजुएशसन और बीआरटी होना जरूरी तय किया गया। मेरी ही तरह बहुत से शिक्षक मित्र इस परिपाटी पर सही भी पाये गए। लेकिन, फिर भी हमे राजनीतिक मोहरा बना कर इस्तेमाल किया गया और वोट बैंक की राजनीति के चलते हमारे भविष्य से खिलवाड़ किया गया।
मौजूदा सरकार पर आरोप लगाते हुए रामशरण कहते हैं। योगी आदित्यनाथ जब उत्तर प्रदेश का चुनाव लड़ रहे थे तो उन्होंने भी प्रदेश में शिक्षकों के मुद्दें पर कई तबाड़तोड़ भाषण दिए। यहां तक कहा कि अगर सत्ता में आया तो सभी को रेग्युलर कर दूंगा। इस एजेंडे को उन्होंने अपने घोषणा पत्र में भी जगह दी। लेकिन, सत्ता में आने के तीन महीने बाद ही उन्होंने पहले तनख्वाह बंद की उसके बाद 1,72000 शिक्षक मित्रों के पद की कैंसल कर दिए। और प्रदेश के एक लाख 72 हजार लोगों के परिवारों को सड़क पर ला खड़ा किया।

रामशरण का गुस्सा जायज भी हो सकता है। और हो भी क्यों नहीं। जब मामला भविष्य का हो तो गुस्सा जायज है। लखनउ के वरिष्ठ वकील नितेश गुप्ता का कहना है कि सहायक शिक्षक बने करीब 22 हजार शिक्षामित्र ऐसे हैं, जिनके पास वांछनीय योग्यता है, लेकिन हाईकोर्ट ने इस पर ध्यान नहीं दिया। उन्होंने कहा कि ये शिक्षामित्र स्नातक बीटीसी और टीईटी पास हैं। ये सभी करीब 10 सालों से भी ज्यादा समय से काम कर रहे हैं।

वहीं शिक्षामित्रों की ओर से पेश वकील ने कहा कि यह कहना गलत है कि शिक्षामित्रों को नियमित किया गया है। उन्होंने कहा कि सहायक शिक्षकों के रूप में उनकी नियुक्ति हुई है। वकीलों का कहना था कि राज्य में शिक्षकों की कमी को ध्यान में रखते हुए स्कीम के तहत शिक्षामित्रों की नियुक्ति हुई थी। उनकी नियुक्ति पिछले दरवाजे से नहीं हुई थी। शिक्षामित्र पढ़ाना जानते हैं। उनके पास अनुभव है। वे वर्षों से पढ़ा रहे हैं। उम्र के इस पड़ाव में उनके साथ मानवीय रवैया अपनाया जाना चाहिए। 
लेकिन, नेता हमारे मामले को लंबा खींचना चाहते हैं ताकि उन्हें इस मामले से लगातार राजनैतिक लाभ मिलता रहे। मायावती की सरकार में हमे राज्य की शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के लिए रखा गया तो अखिलेश की सरकार में मोहरा बना दिया गया और अब योगी आदित्यनाथ की सरकार में तो हमे दर बदर ही कर दिया गया। कुल मिलाकर प्रदेश के एक लाख 72 हजार परिवार जो इन शिक्षा मित्र या सहायकों के परिवार का हिस्सा हैं वे परेशान हैं, लाचार हैं मजबूर है। वो दिल्ली में शायद इसी लिए मौजूद है कि शायद उनकी फरियाद सरकार सुन ले और शायद उन्हें न्याय मिल जाए।  

योगी ने आखिर क्यों किया 1,72000 शिक्षक मित्रों को बेरोजगार, कहीं 2019 तो नहीं है कारण 
लखनऊ की राजनीति को नजदीक से जानने वालों का कहना है कि शिक्षामित्र अपने समायोजन के लिए यूपी की योगी सरकार पर दबाव बना सकती है। उनका कहना है कि 2019 में लोकसभा चुनाव है। यूपी की राजनीति में शिक्षक भर्ती बड़ा मुद्दा होता है, ऐसे में शिक्षामित्र अपनी बात योगी सरकार से मनवाने के लिए बड़ा कदम भी उठा सकते हैं। पिछली सरकार के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान कई रैलियों में कहा था कि अगर केंद्र शिक्षक भर्ती के नियमों में थोड़ा बदलाव कर दे तो उत्तर प्रदेश के शिक्षामित्रों के शिक्षक बनने का रास्ता साफ हो सकता है।
वहीं, हाल ही में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने इस मामले को हवा देते हुए एक बड़ा फैसला लिया। उन्होंने शिक्षामित्रों पर सुप्रीम कोर्ट के दिए गए आदेशों पर अपना रुख साफ कर दिया।  मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने साफ करते हुए कहा है कि शिक्षा मित्रों का मानदेय बढ़ाना हमारे अधिकार क्षेत्र में नहीं है. हमने कैबिनेट बैठक में उनका न्यूनतम मानदेय तय कर दिया है। यानी शिक्षा मित्रों को मानदेय 10,000 रुपये कर दिया गया है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि दस हजार रुपये का निश्चित मानदेय ही उन्हें मिलेगा। इसमें बढ़ोतरी करना उनके अधिकार क्षेत्र में नहीं है। कोर्ट के आदेश पर उनका मानदेय तय किया गया है।
ये फैसला योगी आदित्यनाथ ने उस समय उठाया है जब 2018 के पहले महीने में हिमाचल प्रदेश, गुजरात, राजस्थान में चुनाव हैं। औऱ इन तीनों की प्रदेशों में शिक्षक मित्रों का मुद्दा भी इतना ही बड़ा है जितना उत्तर प्रदेश में। यानी अगर कोर्ट अपना फैसला बदलता है तो योगी सरकार इस जीत को अपने सिर बांधकर हिमाचल प्रदेश, गुजरात और राजस्थान में प्रचार करेगी और अगर ये मामला लंबा खीचता है तो भी वो इस मामले का प्रचार करेगी।

मायावती क्यों दिखा रहीं हैं सहानभूति? 
बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती ने उत्तर प्रदेश में शिक्षामित्रोंके साथ हो रही नाइंसाफी पर सहानुभूति व्यक्त की. उन्होंने मांग की कि यूपी सरकार शिक्षामित्रों के प्रति नरम, सकारात्मक और सहयोगपूर्ण रवैया अपनाए.

मायावती ने कहा कि शिक्षामित्रों जिनमें अधिकतर महिलाएं हैं, का जीवन अधर में लटका है. वे लोग सड़क पर आ गए हैं जबकि उनका काम आने वाली पीढ़ी का जीवन सुधारने का है. वे लोग राज्य सरकार से न्याय और सहारा पाने के लिये लगातार आंदोलन कर रहे हैं. लेकिन योगी सरकार उनकी सुध नहीं ले रही है. शिक्षामित्रों का मासिक वेतन दस हजार रूपए तक सीमित कर शिक्षण कार्य करने के लिए मजबूर किया जा रहा है.

बसपा सुप्रीमों ने आगे कहा कि जब शिक्षामित्र न्यायसंगत नीति बना कर समस्या को हल करने की मांग के समर्थन में आंदोलन करते हैं तो योगी सरकार उन पर लाठियां बरसाती है, जोकि न्यायोचित नहीं है. बसपा शिक्षामित्रों पर हो रहे इस तरह के अत्याचार की निंदा करती है. उन्होंने कहा कि यूपी की भाजपा सरकार को सकारात्मक रूख अपनाकर ऐसी नीति बनानी चाहिए जिससे शिक्षामित्रों की नौकरी सही सलामत रहे और वे वापस शिक्षण के काम में जुट जाएं.

गौरतलब है कि शिक्षामित्र अपने मासिक वेतन की बढ़ोतरी और सुविधाओं के लिए योगी सरकार से गुहार लगा रहे है. लेकिन सरकार उनकी मांगों नहीं मान रही. पिछले सप्ताह शिक्षामित्रों ने लखनऊ विधानसभा का घेराव करने की कोशिश की तो पुलिस ने उनपर लाठी चार्ज कर दिया था

समाजवादी पार्टी की सरकार होती तो नहीं भटकते शिक्षक मित्र
समाजवादी पार्टी के मुखिया और तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का मामले पर कहना है कि उनकी सरकार के दौरान शिक्षक मित्रों की भरपूर मदद उनकी सरकार ने की थी।
कोर्ट में मामला जाने से पहले राज्य सरकार उन्हें नियमित शिक्षकों की भांती ही 40 हजार रुपये की तनख्वाह दे रही थी। लेकिन, 2015 में मामला कोर्ट चला गया और कोर्ट के आदेश के बाद जो मानदेय तय किया गया वो शिक्षकों को दिया गया। इसमें समाजवादी सरकार ने राज्य के शिक्षक मित्रों को ये भरोसा दिया था कि अगर वो सरकार में आते हैं तो इस मामले पर जल्द ही कोई हल निकालेंगे। लेकिन, ऐसा हो नहीं पाया। और अब मौजूदा सरकार इस मामले को तूल देकर इसका राजनैतिक फायदा उठाना चाहती है। जो शायद प्रदेश की आम जनता के लिए कतई ठीक नहीं है।

कोर्ट से मिल चुकी है नाकामयाबी
उत्‍तर प्रदेश के 1.72 लाख शिक्षामित्रों के सहायक शिक्षकों के तौर पर समायोजन पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला बीती जुलाई 2017 को ही आ गया था। कोर्ट ने शिक्षामित्रों को राहत देने से इनकार कर दिया था। हालांकि कोर्ट ने कहा है कि एक लाख 38 हजार शिक्षा मित्र बने रहेंगे।

इसके साथ ही जो 72 हजार सहायक शिक्षक जो शिक्षक बन गए हैं यानी BA और TET करके वो अपने पद पर रहेंगे। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसे शिक्षामित्रों को 2 मौके मिलेंगे TET पास करने के लिए, जिनका सहायक शिक्षकों के तौर पर समायोजन हुआ था। इसके साथ ही शिक्षामित्रों को उम्र के नियमों में छूट मिलेगी।

UP सरकार ने SC में दायर की कंप्लायंस रिपोर्ट, 17 नवंबर को होगी सुनवाई
इसके पहले उत्तर प्रदेश के 1.72 लाख शिक्षामित्रों के सहायक शिक्षकों के तौर पर समायोजन के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 17 मई को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। उल्‍लेखनीय है कि 12 सिंतबर 2015 को हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश के करीब 1.72 लाख शिक्षामित्रों का सहायक शिक्षक के तौर पर समायोजन को निरस्त कर दिया था. इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी।

शिक्षामित्रों की ओर से सलमान खुर्शीद, अमित सिब्बल, नितेश गुप्ता, जयंत भूषण, आरएस सूरी सहित कई वरिष्ठ वकीलों ने अपनी ओर से दलीलें पेश की थी। शिक्षामित्रों की ओर से पेश अधिकतर वकीलों का कहना था कि शिक्षामित्र वर्षों से काम कर रहे हैं. वे अधर में हैं। लिहाजा, मानवीय आधार पर सहायक शिक्षक के तौर पर शिक्षामित्रों के समायोजन को जारी रखा जाए। साथ ही उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से गुहार लगाई कि वह संविधान के अनुच्छेद-142 का इस्तेमाल कर शिक्षामित्रों को राहत प्रदान करें।

शांतिपूर्ण धरने को कैसे दिया गया अंजाम
देश में जब कभी धरनों की बात होती है तो जेहन में दंगे का डर पैदा होता है। हाल की उदहारण ले तो सिरसा में राम रहीम के समर्थकों ने जो किया वो पूरे देश ने देखआ। लेकिन, दिल्ली में तकरीबन 2.50 लाख लोग उत्तर प्रदेश से 10 तारीख से पहुंचे हुए हैं। कुछ अपने परिवार के साथ हैं तो कुछ अकेले ही। दिल्ली में धरने के लिए शिक्षामित्रों को 4 दिन की अनुमति मिली है। धरने को सफल बनाने के लिए शिक्षामित्र संघ के नेताओं ने जिलों से लेकर गांव तक में शिक्षामित्रों से मुलाकात कर दिल्ली जाने का आह्वान किया। हर जिले में इसकी तैयारी बैठक भी की गई। आदर्श शिक्षामित्र वेलफेयर एसोसिएशन के प्रदेश अध्यक्ष जितेन्द्र शाही ने कहा कि 50 हजार से ज्यादा शिक्षामित्र दिल्ली पहुंच रहे हैं।
इसके अलावा पूरे राज्य के अलग अलग हिस्सों से लोग आ रहे हैं। दिल्ली में धरना 11 सितंबर से 14 सितंबर तक रहा। लेकिन, इस धरने प्रदर्शन के दौरान ना तो दिल्ली के लोगों को ही परेशानी हुई और ना ही कोई अप्रिय घटना दिल्ली में घटी।  

क्या है मांग
शिक्षामित्र संघों के बड़े नेता भी इस बीच दिल्ली पहुंचे शिक्षामित्रों का समायोजन 25 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट द्वारा रद्द कर दिया गया है। वहीं उन्हें टीईटी पास करने के बाद ही भर्ती में मौका देने की बात भी फैसले में है। लेकिन शिक्षामित्र लगातार इसका विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि केन्द्र सरकार कानून में संशोधन कर उन्हें समायोजित कर सकती है। वहीं वे शिक्षक बनने तक समान कार्य, समान वेतन की मांग पर अड़े हैं।




Tuesday, March 14, 2017

भाजपा की उत्तर प्रदेश में जीत के मायने बनाम हिटलरशाही की दस्तक !


कहते हैं लोकतंत्र में जब तक बोलने की आजादी ना हो तो वो लोकतंत्र किसी काम का नहीं है। ठीक इसी तरह से संसद में अगर पक्ष की बात काटने वाला या सवाल करने वाला विपक्ष ना हो तो ऐसी सरकार का निरंकुश होना स्वाभाविक ही नहीं सौ प्रतिश्त संभव भी है।
क्योंकि जब विपक्ष कमजोर होगा तो सत्ता में रहने वाली सरकारें अपनी मनमर्जी करेंगी और सत्ता के नशे में वो फैसलें लेंगी जो उनकी शक्ति को बढ़ा सके।
इसका ताजा उदहारण जेएनयू प्रकरण है और उसके बाद दिल्ली विश्वविद्यालक का उदहारण। सवाल ये भी उठता है कि आखिर इतनी बड़ी विजय भाजपा को लगातार क्यों मिल रही है। और क्यों देश में लगातार लीडरशीप भी टूट रही है।
इसकी सीधी वजह पर गौर करें तो हम पाएंगे कि इस कारण का सबसे बड़ा कारण हमारे द्वारा चुनी गए वो सरकारें थी जिनकी योजनाएं जन जन तक नहीं पहुंची और भ्रष्टाचार ने अपनी जड़े सिस्टम में बना ली। जिसके बाद सरकार की शक्तियां कुछ हाथों में ही रह गयी और सत्ता की बार बार चाबी मिलने के बाद भी आम लोगों की जिंदगी में बदलाव नहीं आया हां, भ्रष्टाचार की वजह से लोग सरकारों के खिलाफ जरूर आ गए। ऐसे में दिल्ली से एक नयी उम्मीद की किरण तो जरूरी फूटी लेकिन, वो भी आगे चलकर
बिखर गयी। ऐसे में शीर्ष नेतृत्व की सरकार के पास मौका भी था औऱ ताकत भी कि उसने उत्तर प्रदेश में वो इतिहास लिख दिया जो शायद आजतक की किसी पार्टी ने नहीं लिखा।
उत्तर प्रदेश में भाजपा ने 323 सीटों पर विजय पताका फहराई है। वहीं, इस जीत के साथ ही देश का बुद्धिजीवी इस असमंजस में है कि वो लोकतंत्र के इस सबसे बड़े महाकुंभ के खत्म होने के बाद अभिव्यकित की आजादी, दलित की प्रदेश में स्थिति और लॉ एंड ऑर्डर की स्थिति क्या होगी?
इतना ही नहीं देश का बुद्धिजीवी कहीं ना कहीं ये भी मानने लगा है कि अब या तो स्थिति खराब होगी या फिर बेहतर।
खराब इसलिए हो सकती है क्योंकि ये बात तय है कि इस जीत के बाद स्वर्ण जाति के लोगों का दबाव या ये कहें कि उनकी मनमर्जी ज्यादा बढ़ेगी। अब थानों में फिर से पांडे जी, तिवारी जी एक्टिव मोड में दिखाई देंगे और हो सकता है इस बीच पूरे राज्य में एक बार फिर वहीं स्थिति हो जो आज से 20 साल पहले प्रदेश में थी। यानी की स्वर्णजाति की दबंगई।
और ये दबंगई कोई ऐसी भी नहीं है कि सपा और बसपा के राज में खत्म हो गयी हो। हां, कम जरूर हो गयी थी। लेकिन, अब ये बात तयशुदा मानी जा सकती है कि अब दबंगई हो सकती है। शायद सरकार को भी इस बात का अंदाजा हो और वो प्रदेश में शासनव्यवस्था को ठीक रखने की दिशा में काम कर भी रही हो। लेकिन, ये तब तक नहीं माना जा सकता जब तक की प्रदेश के मुखिया का चेहरा साफ नहीं हो जाता। क्योंकि प्रदेश मे लॉ एंड ऑर्डर की स्थिति क्या होगी ये प्रदेश के मुखिया पर भी निर्भर करेंगा।
वहीं, दूसरी ओर स्थिति में सुधार इस तरह भी हो सकता है कि अगर भाजपा सरकार प्रदेश में रोजगार, शिक्षा, और प्रशासन पर ध्यान देती है तो फिर चौमुखी विकास संभव है। जिसके बाद शायद प्रदेश एक नयी दिशा की ओर बढ़े। लेकिन, ऐसा अगर नहीं हुआ तो स्थिति क्या होगी इसका अंदाजा लगाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन भी है।    

Tuesday, September 20, 2016

परिवार का झगड़ा या मुलायम की सियासी चाल

नई दिल्ली:  कहते हैं राजनीति में जैसा दिखता है वैसा होता नहीं है। और जो होता है वो दिखता नहीं है। उत्तर प्रदेश की राजनीति में भी एक ऐसा ही भूचाल पिछले एक महीने से देखने को मिल रहा था। राजनीति के जानकारों को कहना था कि शायद अब समाजवादी पार्टी में सबसे बड़ा राजनीतिक कुनबा टूट जाएगा। लेकिन, ऐसा हुआ नहीं और शायद होना भी नहीं था। 
क्योंकि जिसतरह से एक के बाद एक घटनाक्रम टूटे और जुड़े उससे साफ नजर आया कि ये एक ऐसी लिखी लिखाई स्क्रिप्ट थी जिसे नेता जी यानी समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव ने बाखूबी निभाया और अब देश के सबसे बड़े राजनैतिक परिवार में छिड़ा धमासान शांत हैं।

वहीं, सवाल ये भी उठता है कि आखिर मुलायम सिंह यादव ने इस घमासान को रोका कैसे?
अगले साल यानी 2017 में उत्तर प्रदेश में विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं। चुनावों में समाजवादी पार्टी की ओर से चुनाव लड़ाएंगे भतीजे अखिलेश यादव और संगठन तैयार करेंगे चाचा शिवपाल यादव। यानि कि चुनाव लड़ने वाला अखिलेश यादव खेमे का और चुनावों में काम करने वाला शिवपाल यादव खेमे का। जी हां, यही है चाचा-भतीजे की जंग को खत्‍म कराने वाला मुलायम फार्मूला।

वहीं, दूसरा सवाल ये भी उठता है कि क्‍या समाजवादी पार्टी अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव के इस फार्मूले से उत्‍तर प्रदेश की सत्ता में वापसी कर पाएगी
सवाल जितना छोटा है इसका जबाव उतना ही बड़ा है। क्योंकि ये वो सवाल नहीं है जिसका हल चंद शब्दों में वयां कर दिया जाए या फिर ऐसा कोई फार्मूला पेश कर दिया जाए जिसमें यूपी का चुनाव तय हो जाए। इसका जवाब ढूंढने के लिए पहले इस पूरे घटनाक्रम को सिलसिलेवार तरीके से समझना होगा।

पिछले चार साल में उत्तर प्रदेश में कानून व्यवस्था चौपट!
उत्तर प्रदेश में पिछले साढ़े चार साल में कानून व्यवस्था अपने सबसे खराब दौर में गुजर रही है। पूरे राज्य में रिश्वत, जबरन उगाही और दलितों पर अत्याचार के मामले बढ़े हैं। वहीं, किसान आत्महत्या का आंकड़े मे भी उछाल आया है। इतना ही नहीं, उत्तर प्रदेश में दंबग और ऊंची जाति के लोगों का छोटी जाति के लोगों पर अत्याचार भी बढ़ रहा है। आए दिन बढ़ रही घटनाओं के चलते मौजूदा समाजवादी पार्टी की सरकार, कभी विसहड़ा में अखलाक के मामले में जबाव नहीं दे पायी तो कभी दलितों की सरेआम पिटाई पर अपने पैर पिटती नजर आई। इतना ही नहीं, सूबे के मुख्यमंत्री के द्वारा जब भी किसी तरह के सख्त कदम दंबग नेताओं या अफसरों के खिलाफ उठाए गए तो वहीं दूसरी ओर से कभी चाचा शिवपाल यादव तो कभी नेता जी ने मामलों के बीच में आकार फैसलों को गलत ठहरा दिया।

विरासत तो सौंपी लेकिन, कमान नहीं
कहते हैं राजनीति में सत्ता से बड़ा कोई सुख नहीं है। औऱ इस बात को मुलायम सिंह से ज्यादा भला कौन जानता होगा। और इसकी जीती जागती मिसाल उनका स्वंय का कुनबा ही है। उनके कुनबे से शायद ही कोई शख्स ऐसा होगा जिसका उत्तर प्रदेश की राजनीति में दखल ना हो। वहीं, स्वंय मुलायम सिंह यादव ने राजगोपाल यादव के कहने पर उत्तर प्रदेश की कमान पुत्र को सौंप तो दी, लेकिन, सत्ता के मोह से खुद को अलग नहीं कर पाए। उनका अखिलेश के हर फैसले में दखल इस बात की तस्दीक करता है। वहीं, चुनाव से पहले सियासी ड्रामा इस बात की गवाही भी दे रहा है।

क्या वाकई सियासी पारा उतर गया?
उत्‍तर प्रदेश में चार दिन से चढ़ा सियासी पारा अब उतरने का दावा किया जा रहा है। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और उनके चाचा शिवपाल यादव के बीच जो आरपार की जंग छिड़ी, उसे खत्म करने के लिए सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव ने सियासी बंटवारा किया और बेटे व भाई को शांत करा दिया। लेकिन राजनीतिक जानकारों का मानना है कि सपा में इस घटनाक्रम से ऐसी चिनगारी सुलगाई है जो सत्ता में वापसी के पार्टी के मंसूबों को राख के ढेर में तब्दील कर सकती है।

नए दांवपेच लगा रही पार्टी
सियासी समीकरण और सूत्रों की मानें तो यह भी माना जा रहा है कि मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को क्लीन फेस वाला नेता बनाए रखने के लिए पार्टी से लेकर सपा सरकार तक नए दांवपेंच से नए समीकरणों की गणित लगायी जा रही है।

मुलायम के कुनबे में कलह या फिर उनका सियासी दांवपेंच !
माना यह जा रहा है कि सपा मुखिया भी कहीं यह तो नहीं चाहते हैं कि उनके पुत्र अखिलेश यादव पर कोई दाग न लगने पाए। अब पांच साल तक प्रदेश में सपा सरकार के कारनामों का ठीकरा किसके सिर पर फोड़ा जाए, यह भी एक सियासत का हिस्सा माना जा सकता है। यह भी कहा जा रहा है कि प्रदेश सपा सरकार के दौरान हुए घोटालों व तमाम कारनामों से अख‍लेश के दामन पर कोई दाग न लगे, इसके लिए कहीं सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव ने यह नया संघर्ष शुरू करवा दिया है।

क्‍या मुलायम के फॉर्मूले से हो पाएगी यूपी में सपा की वापसी?
दरअसल चुनावों का ये जाना-पहचाना फॉर्मूला है कि जीत के लिए लोकप्रिय उम्मीदवार और ताकतवर संगठन दोनों की ही जरूरत होती है। इनमें से किसी एक की कमी या दोनों के बीच समन्वय की कमी से बड़े से बड़े दिग्गज चुनावी मैदान में धूल चाट लेते हैं। लेकिन मुलायम सिंह यादव ने सपा में जारी अंतर्कलह को खत्म करने का जो फॉर्मूला निकाला है उसने संगठन और उम्मीदवार के बीच ऐसी ही अंतर्कलह के बीज बो दिए हैं।
शिवपाल यादव पार्टी के प्रदेशाध्यक्ष बनाए गए हैं। यानी यूपी में संगठन में किस पद पर कौन सा नेता बैठेगा इसका फैसला शिवपाल ही लेंगे। कहना जरूरी नहीं है कि वे संगठन पर अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए अपने विश्वासपात्र नेताओं की ताजपोशी को तरजीह देंगे। दूसरी ओर चुनावों में टिकट बांटने की जिम्मेदारी सौंपी गई है मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को। अखिलेश भी जीत के बाद विधायकों पर अपनी पकड़ कायम रखने के लिए उन्हीं को टिकट देंगे जो उनके भरोसेमंद होंगे।
यानी उम्मीदवार अखिलेश का चहेता होगा और उसके लिए वोट मांगने, घर-घर जाकर पर्चियां बांटने, चुनाव प्रचार करने का जिम्मा जिन संगठन पदाधिकारियों के हाथ में होगा वो शिवपाल यादव के चहेते होंगे। ऐसे में चुनाव के वक्त दो दलों से ज्यादा मुकाबला तो सपा के अंदर देखने को मिल सकती है। कहने की जरूरत नहीं कि अगर ऐसी स्थिति हुई तो विधानसभा के चुनाव नतीजे सामने आने से पहले ही सत्ताधारी समाजवादी पार्टी की हार तय हो जाएगी।  राजनीति के माहिर खिलाड़ी मुलायम सिंह यादव इसे न समझते हों ऐसा हो नहीं सकता। उसके बाद भी अगर उन्होंने शक्तियों का ऐसा विभाजन अपने भाई और बेटे के बीच किया है, तो जानकार मानते हैं कि वो किसी बड़े बवाल की शुरुआत भर है।

'बीजेपी ने मस्जिद गिरवाई, मुस्लिमों ने सपा सरकार बनवाई'
अखिलेश के बाद कोई और हो सकता है सीएम
सियासी दिग्गज यह भी अनुमान लगाने लगे हैं कि यह भी हो सकता है कि सपा मुखिया के कुनबे से लेकर पार्टी और सरकार तक मचे कोहराम के दौरान ही अखिलेश के बाद किसी को और मुख्यमंत्री बनाकर अखिलेश को बेदाग सपा नेता का चेहरा बनाए रखे जाने की जुगत भी हो सकती है। हालांकि अभी इस पर सपा की ओर से कोई कुछ बोलने को तैयार नहीं है।

यूपी में मजबूत उम्मीदवारों पर दांव लगाएगी भाजपा
बीजेपी ने बताया सियासी ड्रामा
पूरे मामले में यूपी भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य ने इस पूरे घटनाक्रम को सपा मुखिया का सियासी ड्रामा कह दिया है। साथ ही मुख्यमंत्री पद से अखिलेश यादव को इस्तीफा दिए जाने की मांग भी कर दी गई है।विपक्ष ने तो यहां तक कहना शुरू कर दिया है कि सपा मुखिया अपने बेटे अखिलेश यादव को बेदाग बनाए रखने के लिए उन्हें दायित्व से भी अलग करने तक का निर्णय ले सकते हैं

बहरहाल, सियासत के जानकारों का मानना है कि मुलायम का दांव फिलहाल ठीक पड़ा है। और इस बार बेशक कुनबा संभल गया है। लेकिन, वहीं ये बात भी तय मानी जा रही है कि ये सिसासी ड्रामा महज अखिलेश को क्लिनचिट देने, प्रदेश के लोगों को उत्तर प्रदेश के मुद्दों से भटकाने और देश की सियासी पार्टियों को ये जताने के लिए लिखी लिखाई वो कहानी थी जिसे समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष ने बाखूवी सुना भी दिया और दिखा भी दिया साथ ही ये तय भी कर दिया कि अभी भी वो समाजवादी पार्टी के सबसे मजबूत और कद्दावर नेता है और आने वाले चुनाव से पहले वो एक बार फिर अपने आप को समाजवादी पार्टी के सबसे बड़े नेता के रूप में पेशकर सत्ता पर काबिज होना चाहते हैं ताकि वो चुनावों से पहले उत्तर प्रदेश की जनता से कह सके कि समाजवादी पार्टी की कमान अब उनके पास हैं और जो पिछली सरकार में गलती हुई वो अनुभव कम होने की वजह से हुई।

 मुलायम सिंह यादव का परिवार बना सबसे बड़ा सियासी कुनबा
उत्तर प्रदेश में सबसे ताकतवर राजनीतिक परिवार माना जाने वाला सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव का सियासी कुनबा हाल में सम्पन्न पंचायत चुनावों में तीन और सदस्यों के निर्वाचन के साथ और मजबूत हो गया है।

 मुलायम सिंह यादव
मुलायम सिंह यादव समाजवादी पार्टी के अगुआ और पार्टी संस्थापक हैं. उन्होंने 4 अक्टूबर 1992 को समाजवादी पार्टी का गठन किया था. अपने राजनीतिक करियर में वह तीन बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री भी रहे.
राजनीति में परिवारवाद को बढ़ावा देने की शुरुआत वैसे तो पं. जवाहरलाल नेहरू ने ही कर दी थी पर लोहिया के चेले कहे जाने वाले मुलायम सिंह ने इसे खूब आगे बढ़ाया. पिछले कुछ वर्षों में जब भी देश में तीसरे मोर्चे की चर्चा होती है, मुलायम सिंह यादव का नाम सबसे पहले लिया जाता है. पेशे से शिक्षक रहे मुलायम सिंह यादव के लिए शिक्षा के क्षेत्र ने राजनीतिक द्वार भी खोले.

शिवपाल सिंह यादव
शिवपाल यादव मुलायम सिंह यादव के अनुज 1988 में पहली बार इटावा के जिला सहकारी बैंक के अध्यक्ष चुने गए. 1996 में सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव ने अपनी जसवंतनगर की सीट छोटे भाई शिवपाल के लिए खाली कर दी थी. इसके बाद से ही शिवपाल का जसवंतनगर की विधानसभा सीट पर कब्जा बरकरार है.

रामगोपाल सिंह यादव
मुलायम सिंह ने 2004 में संभल सीट रामगोपाल के लिए छोड़ दी थी और खुद मैनपुरी से सांसद का चुनाव लड़ा था. रामगोपाल इस सीट से जीत हासिल करके संसद पहुंचे थे. अभी वह राज्यसभा सांसद हैं.

अखिलेश यादव
मुलायम ने 1999 की लोकसभा चुनाव संभल और कन्नौज दोनों सीटों से लड़ा और जीता. इसके बाद सीएम अखिलेश के लिए कन्नौज की सीट खाली कर दी. हम आपको बता दे कि अखिलेश ने इसके पहले फिरोजाबाद से भी चुनाव लड़ा था और वहां से जीत हासिल की थी लेकिन बाद में उन्होने अपनी पत्नी डिंपल यादव के लिये सीट छोड़ दी थी. लेकिन में डिंपल यादव को वहां से करारी शिकस्त मिली. डिंपल ने कन्नौज की सीट से चुनाव लड़ा और बाद में निर्विरोध चुनी गई. इसी के साथ उनकी भी राजनीति में एंट्री हो चुकी थी. अखिलेश यादव 2012 में उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री बने. खास बात यह कि अखिलेश यादव ने सबसे कम उम्र में मुख्यमंत्री बनने का रिकॉर्ड अपने नाम दर्ज किया.

धर्मेंद्र यादव
2004 में सीएम रहते हुए मुलायम सिंह यादव के समय धर्मेन्द्र ने मैनपुरी से चुनाव लड़ा और जीत हासिल की. उस वक्त उन्होंने 14वीं लोकसभा में सबसे कम उम्र के सांसद बनने का रिकॉर्ड बनाया.

डिंपल यादव
अखिलेश यादव ने 2009 के लोकसभा चुनाव में कन्नौज और फिरोजाबाद से जीतकर फिरोजाबाद की सीट की अपनी पत्नी डिंपल यादव के लिए छोड़ दी, लेकिन इस बार पासा उलट पड़ गया और डिंपल को कांग्रेस उम्मीदवार राजबब्बर ने हरा दिया. पहली बार में इस खेल में मात खाने के बावजूद अखिलेश का भरोसा इस फार्मूले से नहीं टूटा. 2012 में मुख्यमंत्री बनने के बाद अखिलेश ने अपनी कन्नौज लोकसभा सीट एक बार फिर डिंपल के लिए खाली की. इस बार सूबे में सपा की लहर का आलम ये था कि किसी भी पार्टी की डिंपल के खिलाफ प्रत्याशी उतारने की हिम्मत नहीं हुई और वो निर्विरोध जीतीं.

तेज प्रताप यादव
तेजप्रताप यादव सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव के पोते हैं. वे मैनपुरी से सांसद हैं. 2014 के लोकसभा चुनाव में मुलायम सिंह यादव ने मैनपुरी और आजमगढ़ दोनों सीटों से चुनाव लड़ा था और दोनों जगहों से जीते. इसके बाद उन्होंने अपनी पारंपरिक सीट मैनपुरी खाली कर दी थी. इस सीट पर उन्होंने अपने पोते तेज प्रताप यादव को चुनाव लड़ाया. तेजप्रताप ने भी अपने दादा को निराश नहीं किया और बंपर वोटों से चुनाव में जीत हासिल की. साथ ही राजनीति में धमाकेदार एंट्री की.

इंग्लैंड की लीड्स यूनिवर्सिटी से मैनेजमेंट साइंस में एमएससी करके लौटे तेजप्रताप सिंह सक्रिय राजनीति में उतरने वाले मुलायम सिंह के परिवार की तीसरी पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते हैं. मुलायम के बड़े भाई रतन सिंह के बेटे रणवीर सिंह के बेटे तेजप्रताप सिंह यादव उर्फ तेजू इस समय सैफई ब्लॉक प्रमुख निर्वाचित हुए हैं. क्षेत्र में समाजवादी पार्टी को मजबूत करने की पूरी जिम्‍मेदारी तेज प्रताप सिंह ने अपने कंधों पर उठा रखी है. परिवार के सदस्‍य इन्‍हें तेजू के नाम से भी पुकारते हैं.

अक्षय यादव
अक्षय यादव मौजूदा समय में फिरोजाबाद से सपा सांसद हैं. अक्षय यादव भी पहली बार चुनाव जीतकर सक्रिय राजनीति में उतरे हैं. यह सीट यादव परिवार की पारंपरिक संसदीय सीट रही है. जब अखिलेश यादव ने वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव में फिरोजाबाद और कन्नौज से चुनाव लड़ा था, उस समय फिरोजाबाद के चुनाव प्रबंधन की कमान अक्षय यादव ने संभाली थी. इसके बाद अखिलेश ने फिरोजाबाद सीट छोड़ दी और उपचुनाव में पत्नी डिंपल यादव को चुनाव लड़ाया. भाभी डिंपल का चुनाव प्रबंधन भी अक्षय ने संभाला था, लेकिन कांग्रेस नेता राज बब्बर ने डिंपल को हरा दिया था.

प्रेमलता यादव
मुलायम सिंह के छोटे भाई राजपाल यादव की पत्‍नी प्रेमलता यादव इस समय इटावा में जिला पंचायत अध्‍यक्ष हैं. आमतौर पर गृहिणी के तौर पर जीवन के अधिकतर वर्ष गुजारने के बाद 2005 में प्रेमलता यादव ने राजनीति में कदम रखा. यहां उन्‍होंने पहली बार इटावा की जिला पंचायत अध्‍यक्ष का चुनाव लड़ा और जीत गईं. 2005 में राजनीति में आने के बाद ही प्रेमलता मुलायम परिवार की पहली महिला बन गईं, जिन्‍होंने राजनीति में कदम रखा. उनके बाद शिवपाल यादव की पत्‍नी और मुलायम की बहू डिंपल यादव का नाम आता है.
प्रेमलता के पति राजपाल यादव इटावा वेयर हाउस में नौकरी करते थे और अब रिटायर हो चुके हैं. रिटायरमेंट के बाद से ही वह समाजवादी पार्टी में अहम भूमिका अदा कर रहे हैं. 2005 में चुनाव जीतने के बाद प्रेमलता ने अपना कार्यकाल बखूबी पूरा किया. इसके बाद 2010 में भी वह दोबारा इसी पद पर निर्विरोध चुनी गई हैं.


सरला यादव
यूपी के कैबिनेट मिनिस्टर शिवपाल यादव की पत्नी हैं सरला यादव. 2007 में जिला सहकारी बैंक इटावा की राज्य प्रतिनिधि बनाया गया था. सरला को दो बार जिला सहकारी बैंक का राज्य प्रतिनिधि बनाया गया. 2007 के बाद लगातार दूसरी बार चुनी गई थी और अब कमान बेटे के हाथ में है.

आदित्य यादव
शिवपाल यादव के बेटे आदित्य यादव जसवंत नगर लोकसभा सीट से एरिया इंचार्ज थे. मौजूदा समय में वह यूपीपीसीएफ के चेयरमैन हैं.

अंशुल यादव
राजपाल और प्रेमलता यादव के बेटे हैं अंशुल यादव. 2016 में इटावा से निर्विरोध जिला पंचायत अध्यक्ष चुने गए हैं अंशुल यादव.

संध्या यादव
सपा सुप्रीमो की भतीजी और सांसद धर्मेंद्र यादव की बहन संध्या यादव ने जिला पंचायत अध्यक्ष के जरिए राजनीतिक एंट्री की है. उन्हें मैनपुरी से जिला पंचायत अध्यक्ष के लिए निर्विरोध चुना गया है.

अरविंद यादव
वैसे परिवार की बात करें तो मुलायम सिर्फ अपने ही परिवार नहीं, चचेरे भाई प्रोफेसर रामगोपाल यादव के परिवार को भी पूरा संरक्षण देते रहते हैं. इसी क्रम में मुलायम की चचेरी बहन और रामगोपाल यादव की सगी बहन 72 वर्षीया गीता देवी के बेटे अरविंद यादव ने 2006 में सक्रिय राजनीति में कदम रखा और मैनपुरी के करहल ब्लॉक में ब्लॉक प्रमुख के पद पर निर्वाचित हुए. अरविंद क्षेत्र की जनता में काफी पहचान रखते हैं. करहल में अरविंद ने समाजवादी पार्टी को काफी मजबूती दिलाई है. लेकिन 2011 के चुनाव में वह आजमाइश के लिए मैदान में नहीं उतर सके. कारण था कि इस चुनाव में करहल ब्लॉक प्रमुख की सीट सुरक्षित हो चुकी थी. लेकिन अरविंद ने हार नहीं मानी है और इस समय वे मैनपुरी लोकसभा सीट के तहत आने वाले करहल ब्लॉक में सपा की मजबूती के लिए काम कर रहे हैं.

शीला यादव
शीला यादव मुलायम के कुनबे की पहली बेटी है जिन्होंने राजनीति में प्रवेश किया. शीला यादव जिला विकास परिषद की सदस्य निर्वाचित हुई हैं, साथ ही बहनोई अजंत सिंह यादव बीडीसी सदस्य चुन गए हैं।



Wednesday, June 22, 2016

मिठास पैदा करने वाली जमीन पर कड़वी राजनीति की पौध

त्तर प्रदेश का मुजफ्फरनगर फिर चर्चा में हैं। क्योंकि चुनाव पास है। और हर चुनाव से पहले पश्चिमी उत्तर प्रदेश ना सुलगे ऐसा कई साल से हो नहीं रहा। आखिर क्या वजह है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश की मीठी जमीन हर चुनाव से पहले लाल हो जाती है?  क्यों पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति गर्मा जाती है। ये कुछ ऐसे सवाल हैं जिनका समय रहते हल खोजना बेहद जरूरी है।
इस बार मुजफ्फरनगर के कैराना से भाजपा सांसद हुकुम सिंह ने एक ऐसा कार्ड खेला जिसके बाद पूरे देश में कैराना रातों रात इस कद्र मशहूर हो गया जैसे कैराना पर पाकिस्तान का कब्जा होने जा रहा है। देश के कुछ मीडिया चैनल इस खबर को इस तरह से परोस रहे हैं जैसे अब पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसान, बेरोजगारी, गरीबी यहां तक की अपराध कोई मुद्दा ही नहीं है। मुद्दा सिर्फ एक है। औऱ वो है पलायन। एक ऐसा मुद्दा जो इस तरह से पेश किया जा रहा है जैसे देश का एक वर्ग दूसरे वर्ग पर कब्जा ही करना चाहता है।

मंशा क्या है?
बीजेपी के कैराना के सांसद हुकुम सिंह का कहना है कि कैराना से सैकड़ों हिंदु परिवारों ने पलायान कर लिया है और ये पलायान जारी है। इसकी वजह पर वो बेहद उटपटांग जबाव देते हैं। यहां तक की वो कई बार एक लिस्ट भी दिखाते हैं। लेकिन, सही जबाव देने के नाम पर वो बगले झांकते नजर आते हैं। वो साफ साफ तो कुछ नहीं कहते लेकिन, इशारों ही इशारों में ये साफ कर देते हैं कि हम ही अपनी ओर से ये एलान कर दें कि देश के हालात बेहद नाजुक हैं। खैर ये तो वो हुकुम सिंह हैं जिनका राजनीति में वजूद ये है कि ये किसी एक पार्टी के कभी होकर नहीं रहे। इनके लिए पश्चिमी उत्तर प्रदेश में एक कहावत सुनी जा सकती है जिसे लोग अक्सर कहते हैं। लोग कहते हैं जिसके देखे तबे परात उसके गाए समिया रात यानी जिसकी झोली हरीभरी होती हैं हुकुम सिंह वहीं होते हैं। यानी एक ऐसा नेता जो सिर्फ और सिर्फ मौके की राजनीति करता है। ऐसे में जब बीजेपी के पास यूपी में कोई मुद्दा नहीं है और हुकुम सिंह को लेकर भी भाजपा में कोई चर्चा नहीं है। ऐसे में ये मुद्दा हुकुम सिंह और भाजपा दोनों के लिए फायदे का सौदा हो सकता है अगर उत्तर प्रदेश की जनता गंभीरता से इस मामले को ना समझे तो।  

आखिर क्यों बिगड़ाना चाहते हैं माहौल ?
हुकुम सिंह पिछले दो साल से यहां सांसद हैं। इस क्षेत्र में इनकी पकड़ भी अच्छी है और ये एक ऐसे नेता भी हैं जिन्हें लोग जानते हैं। लेकिन, इसी के साथ हुकुम सिंह ये भी जानते हैं कि इस बार अगर भाजपा यूपी में नहीं आती तो उनके लिए कोई ठौर-ठिकाना बचेगा नहीं। बसपा और सपा दोनों ही पार्टी से उनका 36 का आंकड़ा है। कांग्रेस इन्हें गोद लेना नहीं चाहती क्योंकि एक बार नहीं बल्कि दो बार ये कांग्रेस का दामन छोड़ चुके हैं। लोकदल का यूपी में अब अस्तित्व शेष नहीं है। और यूपी में इनका इतना बजूद नहीं कि अकेले दम पर ये यूपी के सिरमौर बन जाए। ऐसे में भाजपा को मुद्दा देकर ये अपनी स्थिति जरूर मजबूत कर सकते हैं। और इन्होंने ऐसा किया भी। फिर चाहे उसके लिए माहौल थोड़ा खराब बी क्यों ना हो जाए।

क्या सांसद पिछले दो साल से सो रहे थे? सरदार वी एम सिंह, भारतीय किसान मजदूर पार्टी 
भारतीय किसान मजदूर पार्टी के अध्यक्ष सरदार वी एम सिंह हुकुम सिंह को लेकर कहते हैं। कैराना भाजपा के सांसद द्वारा बनाया जा रहा एक टाइम बम है जो आने वाले दिनों कभी भी फट सकता है। भाजपा के कुछ मंत्री यूपी में लगातार हवा खराब करने की कोशिश में जुटे हैं। पहले गोहत्या पर अब पलायन पर।  
सरदार वी एम सिंह कहते हैं। हुकुम सिंह पिछले दो साल से कैराना से सांसद हैं। क्या वो पिछले दो साल से यहां सो रहे थे? क्या उन्हें इस बात की जानकारी ही नहीं हुई कि यहां से कुछ लोग जा रहे हैंक्या रातों रात ऐसा हो गया? वी एम सिंह कहते हैं ये एक सोची समझी साजिश हैं। जिसे अब अमली जामा पहनाने की कोशिश की जा रही है ताकि वोट बैक को डायवर्ट किया जा सके। होना तो ये चाहिए था कि इस समास्या को समय रहते बतौर एक सांसद ये हल करते। यहां पलायान क्यों हैं इस पर विचार करते। लॉ एंड ऑर्डर मैनटेन करते। और रोजगार, बेरोजगारी किसानों के मुद्दें को हल करते। लेकिन, अफसोस ऐसा हुआ नहीं। अब मुद्दा उठाकर ये लोग साबित क्या करना चाहते हैं। क्या ऐसा हो सकता है कि पाकिस्तान उत्तर प्रदेश में आ सकता है या उत्तर प्रदेश पाकिस्तान जा सकता है। ऐसा कुछ भी नहीं हो सकता फिर ये मुद्दा ही क्यों हैं? सीधी सी बात है मुद्दा आपस में फूट डालने का है ताकि माहौल खराब हो। वहीं, सांसद का घेराव करते हुए वीएम सिंह कहते हैं कि बतौर सांसद तो हुकुम सिंह को अब इस्तीफा दे देना चाहिए और कह देना चाहिए कि मुझसे मेरा इलाका कंट्रोल नहीं हो पाया। नैतिकता के आधार पर मैं इस्तीफा सौंप रहा हूं। क्योंकि सांसद का काम ही होता है समास्या का समाधान, समास्या को और ज्यादा समास्या बना देना ये सांसद का काम कतई नहीं हो सकता। भाजपा पर बरसते हुए सरदार वीएम सिंह ये भी कहते हैं कि भाजपा के यहां 71 सांसद हैं और 2 अपना दल से सांसद भी बीजेपी के साथ ही है। जब इतने बड़ा आंकड़ा बीजेपी के पास हैं तब ये यूपी के हालात खराब करने की कोशिश कर रहे हैं। मुझे हैरत इस बात की होती है कि क्या फूट डलवा कर ही राजनीति में मुकाम हासिल किया जा सकता है।

सियासी लाभ के लिए दंगे कराना चाहती हैं सपा-भाजपा : मायावती
बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कैराना जाने के लिए भाजपा की निर्भय यात्रा और उसके जवाब में सत्ताधारी सपा की सद्भावना यात्राको आपसी मिलीभगत बताया है। उन्होंने कहा कि इसका मकसद आगामी विधानसभा चुनाव से पहले सांप्रदायिक दंगे कराकर चुनावी लाभ उठाना है। मायावती ने यहां जारी एक बयान में कहा कि वैसे तो कैराना से कथित पलायन के मामले को भाजपा सांप्रदायिक रंग देने के साथ-साथ उसका गलत राजनीतिक लाभ उठाने के लिए काफी जोर लगाए हुए हैं। लेकिन सपा सरकार भी राजधर्म को भूलकर ऐसे तत्वों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं कर रही है। उन्होंने कहा कि बसपा की मांग है कि भड़काने का काम करने वालों के खिलाफ तत्काल सख्त कार्रवाई की जाए। वरना उत्तर प्रदेश एक बार फिर सांप्रदायिक दंगे की आग में जलेगा। इसकी पूरी जिम्मेदारी सपा और उसकी सरकार की होगी।

समाजवादी पार्टी किसी हाल में यूपी का माहौल बिगड़ने नहीं देगी : राजेन्द्र चौधरी, प्रवक्ता, सपा
समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता और प्रवक्ता राजेन्द्र चौधरी कहते हैं कि समाजवादी पार्टी किसी भी हाल में कैराना ही नहीं बल्कि पूरे उत्तर प्रदेश में किसी भी प्रकार की साजिश को सफल नहीं होने देगी। पलायन के मुद्दे पर जानकारी देते हुए राजेन्द्र चौधरी कहते हैं। देखिए, उत्तर प्रदेश के बहुत से हिस्सों से लोग आसपास के शहरों मे काम धंधे के लिए जाते हैं। हम आप बहुत से लोग अपने घरों से दूर रहकर काम कर रहे हैं। इसमें पलायन जैसा कुछ नहीं है। क्या पलायन कर लोग देश छोड़ गए। असल में बीजेपी को ये बात अच्छी तरह से पता है कि उनके पास उत्तर प्रदेश के लिए ना कोई मुद्दा है और ना ही कोई विकास का एजेंडा। बीजेपी के पास सिर्फ और सिर्फ धर्म, जाति के नाम पर लोगों के बीच सियासत करना आता है। और इसी के चलते वो यहां पर भी यही चाहते हैं। मेरा ये कहना है कि अगर दो साल से यहां से पलायान हो रहा था तो यहां के सांसद ने इस बात को संसद में क्यों नहीं उठाया। उन्होंने इसकी जानकारी राज्य की सरकार को क्यों नहीं दी। औऱ तो और इसकी जानकारी अब क्यों दे रहे हैं।

कैराना की हकीकत
कैराना पर इतना राजनीतिक बबाल होने के बाद कैराना जाना अलाइवके लिए भी जरूरी हो गया। इसी मकसद से हमारे संवाददाता ने भी कैराना का जायजा लिया। जमीनी हकीकत ये है कि बीजेपी के कैराना से सांसद महोदय ने 346 एसे नाम की सूची जारी की है जो पिछले दो साल मेँ कैराना से अपना बोरियाँ बिस्तरा समेट कर कहीं और चले गए हैष ये सूची किसी सरकारी आंकड़ों से ताल्लुक़ नहीं रखता बल्कि बीजेपी के कर्यकर्ताओ ने घर घर जाकर जुटाई जानकारी के आधार पर बनाई है। हमने सारा दिन कैराना में घूम घूम कर लोगों से बात की। हमे यहां सोहन पाल मिले। 50-55 साल के सोहन पाल यहां बर्फ का काम करते हैं। मुख्य शहर से थोड़ा बाहर मुस्लिम परिवारों की रिहायश के बीच है ये फैक्ट्री। धूप में जल कर काला पड़ चुके चेहरे पर बढ़ी सफ़ेद दाढ़ी किसी डर का एहसास तो नहीं करा रही थी मुझे। सोचा शायद बात करने पर वो डर दिख जाए जिस डर से यहाँ के लोग पलायन करने को मजबूर है जैसी की माननीय सांसद महोदय हुकुम सिंह दावा कर रहे है। बात करते समय किसी भी तरह की कोई झिझक तो दिखी नहीं, बात करते करते इक बात उसके मुँह से निकली जिसने थोड़ा सा पलायन करने के एक कारण पर रोशनी डाल दी और वो थी रंगदारी’  ।  
50 हजार से लाख के बीच की जनसंख्या वाले कैराना में हिंदू परिवार महज़ नाम मात्र के ही है, पिछले कुछ साल से बदमाश यहां के व्यापारियों को रंगदारी के लिए मजबूर कर रहे है। जिसने दे दिया उसकी सांसें चल रही है जिसने नहीं दी उसे सरे आम दिनदहाड़े गोली मार कर मौत के घाट उतार दिया। ये ही डर यहां के लोगों के पलायन का एक कारण भी है। इसे इत्तफ़ाक़ ही कहेंगे की ज़्यादातर पलायन करने वाले हिंदू परिवार हैं। उसी बर्फ़ खाने के ठीक सामने चौधरी जमील की फैकट्री है साथ में उसका भरा पूरा घर , घर के साथ एक डेरी जो की मोहिंदर सिंह की है। सदियों से इसी कैराना में सुख दुख के पलों का एहसास किया। बात करने के लिए जैसे ही पहले में जमील के पास गया तो उसने आवाज़ लगाकर मोहिंदर को बुलाया और कहा आप पहले इन से बात करो, ये ही बेहतर बताएंगे की आख़िर किस बात का डर है और क्या ये भी सांसद की लिस्ट में 347वां नाम लिखवाना चाहते है । बचपन से साथ खाने खेलने वाले दोनों दोस्त और पड़ोसी इस तरह से सांसद महोदय की सूची और दावों की धज्जियाँ उड़ा रहे थे । सब एक ही बात दोहरा रहे थे कि माहौल ठीक है बस बिगाड़ने की कोशिश की जा रही है। सड़क पर चलते लोग भी इसी की तस्दीक़ कर रहे थे। चैनलों पर एक पिक्चर हाल के टूटने की कहानी भी चल रही थी, कि मालिक ने इसे बेच दिया है और रवानगी की तैयारी में है कैराना से। हांलाकि हाल मालिक से तो बात नहीं हो सकी लेकिन आस पास के लोगों से बात की तो पता चला की पिक्चर हाल चल नहीं रहा था,  खरीदार कोई मिल नहीं रहा था और जो भी मिल रहा था तो दाम नहीं दे रहा था। ऐसे में मलबा बेच कर और फिर प्लॉट काट काट कर बेचना मलिक को ज़्यादा फ़ायदे का सौदा लगा। बहरहाल सच को ढूंढ़ने में जुटी यूपी पुलिस का भी कहना है की सूची के 150 परिवार का पलायन तो हुआ है पर कारण डर नहीं बल्कि बेहतर रोज़गार और अपने व्यापार को बढ़ाना है। और ये कोई दो साल से नहीं बल्कि कई साल से चल रहा है। हांलाकि सांसद महोदय इन सब के बावजूद रुकने का नाम नहीं ले रहे एक और लिस्ट के साथ मीडिया के सामने आ खड़े हुए,  इस बार कहानी कैराना नहीं कांधला की है। लेकिन सांसद जी के सुर इस बार थोड़ा सा बदला सा है,  अब मामला सांप्रदायिक नहीं क़ानून व्यवस्था का है।
कैराना के मामले पर अब बीजेपी बैकफुट पर है। औऱ सपा, बसपा और कांग्रेस तीनों ही बड़ी पार्टी भाजपा पर चुटकी ले रही है। कैराना सांसद को भी शायद अपनी गलती का अहसास हो चला है और धीरे धीरे वो भी मामले पर गाहे वगाहे अलग अलग तर्क देते दिखाई दे रहे हैं। वहीं, सवाल ये भी उठता है कि क्या हमारे देश के कुछ नेता लोगों के बीच गलतफहमी और गफलत फैला कर ही राजनीति करते रहेंगे या फिर कभी ठीक मुद्दों पर भी चुनाव भी लड़ेंगे या कभी देश के लोगों की तकलीफों को भी दूर करेंगे जिसके लिए वो चुनाव लड़कर शपथ लेते हैं।

बहरहाल, कैराना में शांति हैं। और यहां के आमजन अपने नेताओं की जमकर खिल्ली उड़ा रहे हैं। और ये शायद सही भी है क्योंकि देर सबेर देश के लोग ऐसे लोगों की राजनीति और मंशा को समझ जो रहे हैं।

कौन हैं बाबू हुकुम सिंह
उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले के कैराना लोकसभा सीट से बीजेपी सांसद हुकुम सिंह इन दिनों समाचारों की सुर्खियों में बने हुए हैं। उन्होंने एक लिस्ट जारी कर आरोप लगाया कि सांप्रदायिक ताकतों के चलते वहां बसे कई हिन्दू परिवारों को घर छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा है। बाद में हुकुम सिंह अपने बयान से पलट गए और उन्होंने कहा  कि यह मामला कानून व्यवस्था का है, सांप्रदायिकता का नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि सांप्रदायिक रंग देकर कुछ लोग इलाके के गुंडों को बचाने की कोशिश कर रहे हैं। 
खैर, जो भी हो हुकुम सिंह खबरों में हैं और चर्चा में लगातार बने हुए हैं। कैराना पर सूची जारी करने के बाद उन्होंने कांधला तहसील की भी सूची जारी की और आरोप लगाया कि यहां के लोग भी पलायन को मजबूर हैं। 


पढ़ाई में बेहद होशियार थे हुकुम सिंह

बीजेपी सांसद हुकुम सिंह मुजफ्फरनगर के कैराना के ही रहने वाले हैं। 5 अप्रैल 1938 को जन्मे बाबू हुकुम सिंह पढ़ाई में काफी होशियार थे। कैराना में ही 12वीं तक की पढ़ाई के बाद परिजनों ने आगे की पढ़ाई के लिए उन्हें इलाहाबाद विश्वविद्यालय भेजा। वहां पर हुकुम सिंह ने बीए और एलएलबी की पढ़ाई पूरी की। इस बीच 13 जून 1958 को उनकी शादी रेवती सिंह से हो गई। उन्होंने वकालत का पेशा अपना लिया और प्रैक्टिस करने लगे। उस समय के जाने माने वकील ब्रह्म प्रकाश के साथ उन्होंने वकालत शुरू की।

जज की नौकरी छोड़ सेना में हुए शामिल

इसी दौरान उन्होंने जज बनने की परीक्षा पीसीएस (जे) भी पास की। जज की नौकरी शुरू करते, इससे पहले चीन ने भारत पर हमला कर दिया और तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने युवाओं से देश सेवा के लिए सेना में भर्ती होने के आह्वान पर वो सेना में चले गए। 1963 में बाबू हुकुम सिंह भारतीय सेना में अधिकारी हो गए। हुकुम सिंह ने बतौर सैन्य अधिकारी 1965 में पाकिस्तान के हमले के समय अपनी टुकड़ी के साथ पाकिस्तानी सेना का सामना किया। इस समय कैप्टन हुकुम सिंह राजौरी के पूंछ सेक्टर में तैनात थे। 1969 में हुकुम सिंह ने सेना से इस्तीफा दे दिया और वापस मुजफ्फरनगर आ गए। 

मौके की राजनीति करने में माहिर के हुकुम सिंह

कुछ ही समय में वह अपने साथी वकीलों के बीच काफी लोकप्रिय हो गए उनके कहने पर बार के अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ लिया और 1970 में वह चुनाव जीत भी गए। 1974 तक उन्होंने इलाके के जन आंदलनों में हिस्सा लिया और लोकप्रिय होते चले गए। हालत ऐसे हो गए थे इस साल कांग्रेस और लोकदल दोनों ही बड़े राजनीतिक दलों ने उन्हें विधानसभा चुनाव लड़ने के तैयार थे। काफी सोच विचार के बाद उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ा और चुनाव जीत भी गए। अब हुकुम सिंह उत्तर प्रदेश की विधानसभा के सदस्य बन चुके थे। 1980 में उन्होंने पार्टी बदली और लोकदल के टिकट पर चुनाव लड़ा और इस पार्टी से भी चुनाव जीत गए। तीसरी बार 1985 में भी उन्होंने लोकदल के टिकट पर ही चुनाव जीता और इस बार वीर बहादुर सिंह की सरकार में मंत्री भी बनाए गए। बाद में जब नारायण दत्त तिवारी मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने हुकुम सिंह को राज्यमंत्री के दर्जे से उठाकर कैबिनेट मंत्री का दर्जा दे दिया।

मुजफ्फरनगर दंगों का आरोप भी लगा


2007 में हुए चुनाव में भी वह विधानसभा पहुंचे। 2013 में मुजफ्फरनगर दंगों के आरोप भी हुकुम सिंह पर लगे। 2014 में बीजेपी के टिकट पर गुर्जर समाज के हुकुम सिंह ने कैराना सीट पर पार्टी को विजय दिलाई। इस लोकसभा चुनाव में पार्टी को यूपी में अभूतपूर्व सफलता मिली। उनको जानने वाले और उनको मानने वाले तो यह तक मान रहे थे कि नरेंद्र मोदी सरकार में उन्हें मंत्री पद भी मिलेगा, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। और शायद यहीं वजह भी है कि वो भाजपा में अब अपनी स्थिति दर्ज करवाना चाहते हैं।